सीएम का सवाल- हेल्थ में प्रदेश कहां, अफसर चुप:भास्कर बता रहा- 1 करोड़ ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधा नहीं, 61% स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 6 जनवरी को एक कार्यक्रम में अफसरों से पूछा- हेल्थ के मामले में हमारा राज्य किस नंबर पर है। इस सवाल पर अफसरों ने जवाब दिया कि हेल्थ के पैरामीटर पर राज्यों की रैंकिंग नहीं होती, इसलिए जवाब देना मुश्किल है। डिप्टी सीएम और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल भी कार्यक्रम में मौजूद थे। वे बोले- मातृ और शिशु मृत्यु दर को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे पैरामीटर में मप्र बेहतर कर रहा है। दैनिक भास्कर ने जब मप्र के हेल्थ पैरामीटर की जांच की तो पाया कि प्रदेश की 1 करोड़ ग्रामीण आबादी के पास उप स्वास्थ्य केंद्र जैसी बेसिक इलाज की सुविधा नहीं है। अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 61 फीसदी पद खाली पड़े हैं। खुद स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में ये आंकड़ा बताया है। साथ ही नियंत्रक महालेखाकार यानी सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि मप्र के जिला अस्पतालों में पैरामेडिकल स्टाफ के 60 फीसदी पद खाली हैं। पढ़िए, मप्र के स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बताने वाली ये रिपोर्ट… पहले जानिए, सीएम ने अफसरों से क्या सवाल किए
सीएम डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को प्रदेश के 21 जिलों के 87 आदिवासी ब्लॉक में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए 66 मोबाइल मेडिकल यूनिट को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके बाद उन्होंने सीएम हाउस के समत्व भवन में हुए कार्यक्रम को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल, स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव, नेशनल हेल्थ मिशन की एमडी डॉ. सलोनी सिडाना भी मौजूद थे। सीएम के अफसरों से सवाल-जवाब सीएम: अभी मुझे मालूम नहीं है कि रैंकिंग में देश के परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य विभाग का कौन सा नंबर है? संदीप यादव, पीएस हेल्थ: सभी स्कीम में हम टॉप 3 में हैं। सीएम: स्कीम में हैं या हेल्थ डिपार्टमेंट में, मंत्रालय के लेवल पर पूरे देश में किस स्थान पर हैं? संदीप यादव, पीएस हेल्थ: डिपार्टमेंट वाइज नहीं होती। अलग-अलग सेक्टर और अलग-अलग प्रोग्राम हैं। जैसे सिकलसेल है, टीबी है। सीएम: जैसे मैं एजुकेशन की बात करूं या दूसरे डिपार्टमेंट की तो देश के सबसे अच्छे राज्यों में हेल्थ के मामले में हमारा राज्य किस नंबर पर है? मामले को संभालते हुए बीच में डिप्टी सीएम शुक्ला बोले: आईएमआर (शिशु मृत्यु दर) और एमएमआर (मातृ मृत्यु दर) को छोड़ दें तो बाकी चीजों में हम अच्छी स्थिति में हैं। आईएमआर और एमएमआर को सुधारने का भी रोडमैप बनाया गया है। सीएम: मेडिकल एजुकेशन में किस श्रेणी में हैं? पिछले 5-10- 20 साल में हमने किसे बीट किया? हम कहां से आगे बढ़ रहे हैं? मेडिकल कॉलेज खोलने की दृष्टि से? आयुष डिपार्टमेंट भी आप ही देखते हैं? संदीप यादव, पीएस हेल्थ: नहीं वो आहूजा जी देखते हैं। सीएम: क्या हर एक जिले में एक्स-रे मशीन पहुंच गई है? डॉ. सलोनी सिडाना, एमडी(NHM): जी सर, पहुंच गई है। भास्कर ने 4 पैरामीटर पर की स्वास्थ्य सेवाओं की पड़ताल सिलसिलेवार जानिए चारों पैरामीटर्स की स्थिति 1. एक हजार में से 48 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं मनाते
भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय हर तीन साल में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे(NFHS) रिपोर्ट जारी करता है। इस समय साल 2019 से लेकर 2021 तक NFHS-5 की रिपोर्ट मौजूद है। इस रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में एक लाख में से 173 महिलाएं गर्भावस्था, डिलीवरी या उसके बाद के पीरियड में जटिलताओं की वजह से दम तोड़ देती हैं। मप्र सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर के मामले में देश में तीसरे नंबर पर है। वहीं, शिशु मृत्यु दर के आंकड़े भी चिंताजनक हैं। एमपी में 1 हजार नवजात में से 35 की मौत हो जाती है। शिशु मृत्यु दर 1 हजार में 48 और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर भी 56 है। 2. ग्रामीण इलाकों में 2 हजार उप स्वास्थ्य केंद्रों की कमी
मप्र में 10256 उप स्वास्थ्य केंद्र हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक मप्र की आबादी 7.26 करोड़ है। इसमें ग्रामीण आबादी करीब 5.22 करोड़ है और आदिवासी वर्ग की आबादी करीब 1.52 करोड़ है। जनसंख्या के हिसाब से आदिवासी बहुल इलाकों में 3 हजार की ग्रामीण आबादी पर एक उप स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। इस हिसाब से आदिवासी इलाकों में 5066 उप स्वास्थ्य केंद्रों की जरूरत है। वहीं, गैर आदिवासी बहुल इलाकों में 5 हजार की ग्रामीण आबादी पर एक उप स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। इस हिसाब से 7262 उप स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। यानी एमपी में 2072 उप स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। 3. पैरामेडिकल स्टाफ के 60 फीसदी पद खाली
नियंत्रक महालेखाकार की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश के जिला अस्पतालों में औसतन 35 फीसदी नर्सेज और 60 फीसदी तक पैरामेडिकल स्टाफ के पद खाली हैं। इसके अलावा सिविल अस्पतालों में 60 फीसदी नर्सेज के पद और पैरामेडिकल स्टाफ के 55 फीसदी तक पद खाली हैं। सीएजी की ही रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञ डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है। 4. एमपी के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 39% पद भरे
बैतूल के बीजेपी विधायक हेमंत खंडेलवाल के विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने बताया कि मप्र के सरकारी अस्पतालों में 4167 पद स्वीकृत हैं। इनमें से सिर्फ 1604 पद ही भरे हुए हैं। इसमें भी स्त्री रोग विशेषज्ञों के कुल 708 पदों में से 390 पद खाली हैं। वहीं, शिशु रोग विशेषज्ञों के कुल 624 पदों में से 315 पद खाली है। अस्पतालों में 75% सर्जन की कमी है। एक जिले के सेटअप से समझिए स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बैतूल में स्वास्थ्य अधिकारी के 4 पद खाली
24 दिसंबर को विधानसभा में सवाल पूछा गया था कि बैतूल में स्वास्थ्य विभाग के कितने पद भरे हैं और कितने खाली हैं। इस सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि बैतूल जिले में 6 में से 4 स्वास्थ्य अधिकारी के पद खाली हैं। इसमें भी सिविल सर्जन, जिला स्वास्थ्य अधिकारी और जिला टीकाकरण अधिकारी का पद खाली पड़ा है। शिशु रोग विशेषज्ञ के 7 पद स्वीकृत, 5 खाली
​​​​​​​बैतूल जिला अस्पताल में विशेषज्ञों के लिए 30 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 17 स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स के ही पद भरे हैं। रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, ऐनेस्थीसियालॉजिस्ट, टीबी विशेषज्ञ के स्वीकृत पद होने के बाद भी पद खाली हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ के 7 पद स्वीकृत हैं, लेकिन सिर्फ 2 ही शिशु रोग विशेषज्ञ काम कर रहे हैं। जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में एक भी डॉक्टर नहीं है। मेडिकल, सर्जिकल और अस्थिरोग विशेषज्ञ के सारे पद खाली हैं। यानी दुर्घटनाओं के मामलों को देखने के लिए कोई विशेषज्ञ नहीं है। 9 स्वास्थ्य केंद्रों में 40 पद, स्वीकृत केवल 2 डॉक्टर
​​​​​​​बैतूल जिले के सेहरा, शाहपुर, घोडाडोंगरी, चिचोली, भीमपुर, भैंसदेंही, आठनेर, मुलताई, प्रभातपट्‌टन में 9 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनके लिए डॉक्टरों के 40 पद स्वीकृत हैं। मगर, केवल 2 डॉक्टर ही काम कर रहे हैं। किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में स्त्री रोग विशेषज्ञ, मेडिकल एक्सपर्ट, सर्जिकल एक्सपर्ट नहीं है। 9 में से 7 सामुदायिक केंद्र ऐसे हैं, जिनमें न तो ब्लॉक हेल्थ ऑफिसर है और न ही कोई एक्सपर्ट डाॅक्टर। ये खबर भी पढ़ें… नियम तोड़कर सरकारी खर्चे पर सिंगापुर गए अफसर:एमपी में कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स ने खुद को प्रिंसिपल बताया; इनसे पूरा खर्च वसूल सकता है शिक्षा विभाग स्टार्स परियोजना (स्ट्रेंथनिंग टीचिंग-लर्निंग एण्ड रिजल्ट्स फॉर स्टेट्स प्रोजेक्ट) के तहत मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग का 68 सदस्यीय दल 5 जनवरी को सिंगापुर रवाना हो गया है। स्कूल शिक्षा विभाग की तरफ से इस विदेश यात्रा के लिए उम्र, पद और परफॉर्मेंस का क्राइटेरिया तय किया गया था। पूरी खबर पढ़ें…

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