2 साल बाद ‘मोदी की गारंटी’ का रिपोर्ट कार्ड:11 हजार नौकरियां और 2.5 लाख का वादा…यही सबसे बड़ा चैलेंज; युवाओं का मन कैसे मोहेंगे मोहन

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 के नतीजे आए दो साल पूरे हो चुके हैं। दिवाली से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ‘मोदी की गारंटी, भाजपा का भरोसा’ नाम से अपना संकल्प पत्र जारी किया था। यह नारा दिया गया कि ‘मध्यप्रदेश के लिए ये मोदी की गारंटी है, क्योंकि एमपी के मन में मोदी हैं।’ इस नारे ने काम किया और 17 नवंबर को हुई वोटिंग के बाद 3 दिसंबर को जब नतीजे आए, तो बीजेपी ने 230 में से 164 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। यह 2003 के बाद प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी जीत थी। इस ऐतिहासिक जनादेश के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में एक अप्रत्याशित नाम चुना उज्जैन दक्षिण से तीसरी बार के विधायक, डॉ. मोहन यादव। 13 दिसंबर को मोहन यादव सरकार अपने कार्यकाल के दो साल पूरे कर रही है। ऐसे में सबसे बड़ा और स्वाभाविक सवाल यही है कि ‘मोदी की गारंटी’ पर दो साल बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव कहां खड़े दिखते हैं? भास्कर ने मोदी की 10 बड़ी गारंटी की हकीकत देखी तो हर परिवार को रोजगार और हर बेघर को मकान, गरीब बच्चों के लिए 12वीं तक मुफ्त शिक्षा अब भी एक सपना है। आईआईटी-एम्स की तर्ज पर उच्च शिक्षण संस्थान खोलने की योजना भी धरातल पर उतरती नहीं दिख रही है। हालांकि, मुख्यमंत्री, उनके अफसर, विधायक और पार्टी प्रवक्ता एक सुर में कहते हैं कि सरकार संकल्प पत्र के हर वादे को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। पढ़िए रिपोर्ट… अब इन गारंटी के बारे में सिलसिलेवार जानिए 1. हर परिवार को रोजगार: हकीकत-अब तक 11 हजार को नौकरी
यह संकल्प पत्र का सबसे महत्वाकांक्षी वादा था। इस गारंटी पर सरकार के पास कोई ठोस और सीधा जवाब नहीं है। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि पुलिस और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की नई भर्तियों को मंजूरी मिल चुकी है और सरकार हर विभाग में खाली पड़े पदों का आकलन कर रही है। मगर, धरातल पर तस्वीर युवाओं के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि हर परिवार को रोजगार और मकान देने पर सरकार काम कर रही है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। रोजगार के सवाल पर मुख्यमंत्री मोहन यादव कहते हैं कि वर्ष 2025 को रोजगार वर्ष घोषित किया गया है। इन्वेस्टर्स मीट में 32 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले हैं, इसमें 8.57 लाख करोड़ के प्रस्ताव जमीन पर उतर रहे हैं। मध्यप्रदेश सबसे ज्यादा निवेश प्रस्ताव लाने वाला राज्यों में तीसरे नंबर पर है। सरकार की दो साल की उपलब्धियों वाले ब्यौरे में कहा गया है कि दो साल में 11 हजार को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र दिए गए हैं, और टारगेट 2.50 लाख नौकरियों का है। बीजेपी का दावा- वादे पूरे हो रहे
बीजेपी की प्रवक्ता डॉ. वाणी अहलूवालिया कहती हैं कि मोहन सरकार क्रमबद्ध तरीके से रोजगार-आवास और स्किल डेवलपमेंट जैसे आयामों की पूर्ति करती जा रही है। जितनी भी रीजनल कॉन्क्लेव और इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव के जरिए जो भी उद्योग स्थापित हो रहे हैं, वहां स्किल डेवलपमेंट के साथ युवाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इन सेक्टर्स में रोजगार बढ़ा रहे हैं। रोजगार के नए आयाम स्थापित करने के लिए हम वचनबद्ध हैं। बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल आंकड़ों के साथ दावा करते हैं। प्रत्यक्ष रूप से दो साल में 60 हजार नौकरियां मिली हैं। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में 2 लाख से ज्यादा रोजगार दिए गए हैं। आने वाले समय में मध्यप्रदेश सरप्लस एम्प्लॉयमेंट स्टेट होगा। युवा बोले- सरकार मुश्किल से जागती है
एलएलबी की स्टूडेंट सुरभि त्रिपाठी कहती है कि जितनी वैकेंसी निकलती है, उससे कहीं ज्यादा जॉब सीकर हैं। पटवारी घोटाले के बाद भी सरकार ने उस पर कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। इससे पता चलता है कि रोजगार के मुद्दे पर सरकार मुश्किल से ही जागती है। वहीं सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अमन कुशवाह का मानना है कि भर्तियां निकलती भी हैं तो कागजों में रह जाती हैं। सही से पेपर नहीं हो रहे, हो रहे हैं तो लीक हो जा रहे हैं। 2. आईआईटी-एम्स की तर्ज पर संस्थान: अब भी इंतजार
मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का जोर दिख रहा है। प्रदेश में नए-नए मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं, लेकिन एक बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी है। मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों और ट्रेंड स्टाफ की कमी के सवाल पर मुख्यमंत्री का जवाब है कि हम छोटे शहरों में ज्यादा तनख्वाह देकर डॉक्टर्स को आकर्षित करने पर विचार कर रहे हैं। प्रदेश में 19 सरकारी मेडिकल कॉलेज हो चुके हैं। हाल ही में खजुराहो कैबिनेट में मुख्यमंत्री ने बुंदेलखंड के दमोह, टीकमगढ़, पन्ना और कटनी में चार नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की है। मगर, संकल्प पत्र का वादा सिर्फ कॉलेज खोलने का नहीं, बल्कि एम्स की तर्ज पर ‘मध्यप्रदेश इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ बनाने का था, जो अब तक कहीं आकार लेता नहीं दिख रहा है। इसी तरह, ‘मध्यप्रदेश इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ बनाने की दिशा में भी कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा है। 3. लाड़ली बहनों को मकान: रास्ता साफ, योजना मर्ज
यह उन कुछ बड़ी घोषणाओं में से एक है, जिस पर सरकार तेजी से आगे बढ़ी है। संकल्प पत्र में लाड़ली बहनों को आर्थिक सहायता के अलावा आवास देने का वादा था। इसके लिए ‘मुख्यमंत्री जन आवास योजना’ लाई गई, जिसे सरकार ने 2023 में ही मंजूरी दे दी थी। वित्तीय भार को कम करने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा था कि इस योजना को ‘प्रधानमंत्री आवास योजना 2.0’ में मर्ज कर लिया जाए। केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद अब यह योजना उसी में शामिल कर ली गई है, जिससे इसके क्रियान्वयन का रास्ता साफ हो गया है। 4. कोई परिवार बेघर नहीं रहेगा: 39 लाख को पट्‌टे देने का दावा
इस वादे को पूरा करने के लिए सरकार ने 2020 तक सरकारी जमीन पर काबिज लोगों का सर्वे शुरू किया है। सरकार ने दावा किया है कि 39.60 लाख लोगों को जमीन या घर के स्वामित्व अधिकार पत्र दिए जा चुके हैं। हालांकि इस सबके बावजूद सभी शहरों में झुग्गी बस्तियों की संख्या कम होती नहीं दिख रही है। 5. मिड-डे मील के साथ नाश्ता और 12वीं तक मुफ्त शिक्षा योजना:ठंडे बस्ते में
संकल्प पत्र में सरकारी स्कूल के बच्चों को पौष्टिक नाश्ता देने का वादा था, लेकिन दो साल बाद भी इस पर अमल नहीं हो सका है। मिड-डे मील योजना पहले की तरह चल रही है। इसी तरह, गरीब परिवार के बच्चों को 12वीं तक मुफ्त शिक्षा देने के वादे पर भी कोई सीधा काम नहीं हुआ है। मेरिट में आने वाले बच्चों को स्कूटी, लैपटॉप और सरकारी स्कूल की बेटियों को साइकिल देने जैसी पुरानी योजनाएं जारी हैं, लेकिन मुफ्त शिक्षा का कोई एकीकृत ब्लू प्रिंट अब तक सामने नहीं आया है। 6. राशन की दुकान पर दाल और तेल: अधूरा वादा
सरकारी राशन की दुकानों पर रियायती दाम पर अनाज के अलावा दाल और सरसों का तेल देने की घोषणा पर भी अधूरा अमल हुआ है। अनाज तो पहले की तरह मिल रहा है, लेकिन दाल और तेल अब तक दुकानों तक नहीं पहुंचे हैं। सरकार ने दावा किया है कि 1.33 करोड़ परिवारों को निशुल्क अनाज वितरण किया जा रहा है, लेकिन दाल और तेल का जिक्र नहीं है। कैसे बना था बीजेपी का संकल्प पत्र?
बीजेपी ने चुनाव से पहले संभाग स्तर पर ‘जनआशीर्वाद यात्राएं’ निकाली थीं। 21 दिनों तक चली इन यात्राओं में 52 जिलों में प्रबुद्धजन सम्मेलन हुए, जहां लोगों ने अपने सुझाव दिए। इन्हीं सुझावों के अध्ययन के बाद संकल्प पत्र तैयार किया गया। संकल्प पत्र समिति के अध्यक्ष, वरिष्ठ विधायक जयंत मलैया कहते हैं ‘संकल्प पत्र पूरे 5 साल के लिए होता है। 2 साल में आप इसका आकलन नहीं कर सकते। ‘संकल्प पत्र बना तब मोहन भी नहीं जानते थे कि वे मुख्यमंत्री बनेंगे’
वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकर इस पर एक दिलचस्प राजनीतिक टिप्पणी करते हैं। वे कहते हैं कि सरकार घोषणा पत्र से बंधी रहे, यह सैद्धांतिक रूप से सही है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। घोषणा पत्र को एक्सपर्ट बनाते हैं और लागू करने का काम राजनेता का होता है। यदि राजनेता ही घोषणा पत्र बनाते तो हम उनसे पूछ सकते थे कि यह अब तक क्यों पूरा नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में जब बीजेपी का घोषणा पत्र आया, तब मोहन यादव खुद भी नहीं जानते थे कि सरकार बनने पर वे मुख्यमंत्री बनेंगे। गिरिजाशंकर 1980 के दशक से शुरू हुे लोकलुभावन घोषणाओं के सिलसिले का भी जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि पहले चुनाव विचारधारा पर लड़े जाते थे, लेकिन 1980 में आंध्रप्रदेश में एनटी रामाराव ने मुफ्त घोषणाओं का मॉडल शुरू किया था। जो बाद में तमिलनाडु में जयललिता से लेकर पूरे देश में फैल गया। वे घोषणा पत्रों की टाइमिंग पर भी सवाल उठाते हैं। ज्यादातर लोग तो पार्टियों का घोषणा पत्र पढ़ते ही नहीं, क्योंकि यह वोटिंग से कुछ दिन पहले आता है।

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