देश के चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा का कहना है- डिजिटल प्लेटफॉर्म ने काम को आसान और तेज किया है, लेकिन जो लोग इससे अपरिचित है, उन वादियों को किसी भी प्रकार से वंचित नहीं रखा जाए। न्याय प्रणाली में डिजिटल डिवाइड केवल तकनीक तक पहुंच और गैर-पहुंच का सवाल नहीं है, बल्कि यह सहायता प्राप्त और बिना सहायता वाले तकनीकी उपयोगकर्ताओं के बीच अधिक गंभीर रूप में सामने आता है। उन्होंने ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तीसरे चरण का जिक्र किया, जिसमें पूरी तरह से कंप्यूटरीकृत कोर्ट, ई-फाइलिंग, ऑनलाइन और हाइब्रिड (ऑनलाइन और सामने से) सुनवाई और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के ज़रिए डेटा-आधारित शासन की सोच रखी गई है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में बिना रुकावट और सबको साथ लेकर न्याय दिलाने के लिए अच्छे कर्मचारियों वाले ई-सेवा केंद्र, SUHAS जैसे आसान टूल, मोबाइल से पहुंच और एक राष्ट्रीय डिजिटल नीति की सख्त जरूरत है। दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट और राजस्थान राज्य न्यायिक अकादमी ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी के साथ मिलकर 13 दिसंबर को जैसलमेर में क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस रखी। इसका विषय ‘टेक्नोलॉजी के ज़रिए कानून का राज आगे बढ़ाना: मौके और मुश्किलें’ रखा गया है। कॉन्फ्रेंस के पहले सत्र को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने संबोधित किया। वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान उच्च न्यायालयों के माननीय न्यायाधीशों, पश्चिमी क्षेत्र के न्यायिक अधिकारियों और अन्य हितधारकों ने भाग लिया। इसका मुख्य उद्देश्य टेक्नोलॉजी का सही और सबको साथ लेकर चलने वाला इस्तेमाल करके न्याय तक लोगों की पहुंच को मजबूत करना था। ई- कोर्ट ने शुरू कीं कई नई डिजिटल सेवाएं कॉन्फ्रेंस में राजस्थान हाईकोर्ट ने कई नई डिजिटल इनिशिएटिव शुरू किए। इन सेवाओं का मकसद नागरिकों को बेहतर सेवा देना, काम में पारदर्शिता लाना और न्याय तेज़ी से दिलाना है। इनका उद्देश्य कोर्ट तक सभी की पहुंच आसान बनाना, नियमों की रुकावटें हटाने और लोगों का भरोसा बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना प्रमुख रहा। जजों ने कहा गांव और कमजोर लोगों की मदद करनी चाहिए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई ने भी CJI के विचारों का समर्थन किया। उन्होंने कहा- टेक्नोलॉजी के इस दौर में इन बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि संविधान में सबको डिजिटल तरीके से शामिल करने की बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। गांव और कमजोर लोगों को टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में मदद करनी चाहिए। साथ ही AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) वाले सिस्टम में इंसानों की निगरानी (ह्यूमन ओवरसाइट) जरूरी है। इसके अलावा जजों और स्टाफ की ट्रेनिंग बढ़ाना और टेक्नोलॉजी आखिरी आदमी तक पहुंचे, इसका भी ध्यान रखना चाहिए। ‘मीडिया ट्रायल’ और AI के इस्तेमाल पर सावधानी दूसरे सेशन में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया से न्याय में आने वाली मुश्किलों पर बात हुई। जस्टिस ए.एस. चांदुरकर ने सनसनीखेज खबरों, गलत जानकारी और बढ़ते “मीडिया ट्रायल” (मीडिया में ही फैसला सुना देना) के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि संविधान में मिली बोलने की आज़ादी और उस पर लगाए गए सही प्रतिबंधों में संतुलन बनाना होगा । जस्टिस दीपांकर दत्ता ने AI पर आंख बंद करके भरोसा न करने की चेतावनी दी। वहीं, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने गोपनीयता (प्राइवेसी), सही जानकारी पर आधारित लोगों की चर्चा और रचनात्मक आलोचना पर जजों के खुलेपन के महत्व पर ज़ोर दिया । ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) से केस कम होंगे तीसरा सेशन ADR (आपसी सुलह से विवाद निपटाना) और ODR (ऑनलाइन सुलह) में टेक्नोलॉजी की भूमिका पर केंद्रित था। डॉ. जस्टिस पुष्पेन्द्र सिंह भाटी ने कहा कि ODR में पेंडिंग (लंबित) मामलों को निपटाने और काम को तेज़ करने की बड़ी क्षमता है । हालांकि उन्होंने AI की मदद से होने वाले कामों में भी इंसानी निगरानी की ज़रूरत बताई । जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत न्याय मिलना केवल कोर्ट तक पहुंचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय को महसूस करने का अनुभव है । उन्होंने कहा कि ADR को बढ़ावा मिलना चाहिए, क्योंकि यह विवाद सुलझाने का एक अच्छा और मानवीय तरीका है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी ने डेटा सुरक्षा और AI से जुड़े क़ानूनी ढांचे पर बात की । उन्होंने साफ़ कहा कि टेक्नोलॉजी को जजों की मदद करनी चाहिए, न कि इंसान के फैसले या संवेदनशीलता की जगह लेनी चाहिए ।


