टेक्नोलॉजी बनी ‘जज’ की ताकत, साइबर क्राइम पर मंथन:जजों ने कहा- AI न्याय में हेल्प करेगा, पर फैसला इंसान को लेना होगा; डिजिटल एविडेंस पर फोकस जरुरी

राजस्थान हाई कोर्ट और राजस्थान स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के साथ मिलकर जैसलमेर में ‘वेस्ट ज़ोन रीजनल कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन किया। कॉन्फ्रेंस का टॉपिक था- ‘तकनीक के ज़रिए क़ानून के राज को मज़बूत करना: चुनौतियां और अवसर’। होटल रंग महल में आयोजित हुई कॉन्फ्रेंस के दूसरे और आखिरी दिन रविवार को न्याय व्यवस्था के सामने आ रही टेक्निकल प्रॉब्लम्स पर डिटेल में डिस्कशन हुआ। दो दिनों के डिस्कशन के बाद, राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्रसिंह भाटी के धन्यवाद के साथ यह कॉन्फ्रेंस ख़त्म हुई। इस कॉन्फ्रेंस में देश भर के वेस्टर्न जॉन के चार राज्यों के करीब 200 के करीब जजेज ने हिस्सा लिया, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण था चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया सुर्यकान्त का इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होना। साइबर क्राइम पर चर्चा
चौथे सेशन में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमानतुल्लाह ने साइबर क्राइम और डिजिटल फोरेंसिक पर बात की। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि न्याय प्रणाली को डिजिटल टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अपनाने में हिचकिचाहट छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि साइबर क्राइम की कोई बाउंड्री नहीं होती और अक्सर गंभीर नुकसान होने के बाद ही इनका पता चलता है। उन्होंने डिजिटल फोरेंसिक, मॉडर्न इन्वेस्टिगेशन तकनीक, ज्यूरिसडिक्शन (क्षेत्राधिकार) की मुश्किलों, ई-सबूत (E-Evidence) के मैनेजमेंट रूल्स और AI से बने कंटेंट से पैदा हो रहे खतरों पर ध्यान दिलाया। राजस्थान के एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा कि न्याय व्यवस्था में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल समावेशी, नैतिक और संवैधानिक वैल्यूज के हिसाब से होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि तेज़ी से बदलती टेक्नोलॉजी के दौर में ज्युडिशियरी (न्यायपालिका) की अडॉप्टेशन पॉवर बहुत जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि टेक्नोलॉजी एफिशिएंसी (दक्षता) बढ़ा सकती है, लेकिन यह जस्टिस का ऑप्शन नहीं, सिर्फ़ एक टूल होना चाहिए। AI सिर्फ़ एक असिस्टेंट
आखिरी और 5वें सेशन में ‘न्यायिक फैसलों की क्वालिटी सुधारना: इमर्जिंग और फ्यूचर टेक्नोलॉजी’ पर चर्चा हुई। जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह ने कहा कि AI ज्यूडिशियल वर्क में हेल्प कर सकता है, पर इसे हमेशा इंसानी विवेक (Human Judgement), क़ानूनी तर्क और संवैधानिक मूल्यों के कंट्रोल में रहना चाहिए। जस्टिस मनमोहन ने पेंडिंग केसों की चुनौती का जिक्र करते हुए कहा कि नई टेक्नोलॉजी अगर ज़िम्मेदारी से अपनाई जाए, तो कोर्ट्स की एफिशिएंसी और फैसलों की क्वालिटी में बड़ा सुधार आ सकता है। जस्टिस अनूप चितकारा ने डीप फेक और AI से बने कंटेंट से जुड़े रिस्क पर बात की। उन्होंने कहा कि ऐसी टेक्नोलॉजी सबूतों की विश्वसनीयता और लोगों के भरोसे को ख़राब कर सकती है। उन्होंने मेटा डाटा एनालिसिस की इम्पॉर्टेंस भी बताई। जस्टिस राजेश बिंदल ने कहा कि टेक्नोलॉजी अपनाने के साथ-साथ सावधानी, लगातार मॉनिटरिंग और इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट जरूरी है। उन्होंने नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के ज़रिए फोरेंसिक कैपेसिटी और टेक्निकल स्किल बढ़ाने पर बल दिया। दो दिनों के डिस्कशन के बाद, राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्रसिंह भाटी के धन्यवाद के साथ यह कॉन्फ्रेंस ख़त्म हुई। ये खबर भी पढ़ें। …. ‘डिजिटल प्लेटफॉर्म से अंजान याचिकाकर्ता को वंचित नहीं रख सकते’:CJI ने ज्यूडिशियल कॉन्फ्रेंस में नेशनल डिजिटल पॉलिसी की जताई जरूरत देश के चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा का कहना है- डिजिटल प्लेटफॉर्म ने काम को आसान और तेज किया है, लेकिन जो लोग इससे अपरिचित है, उन वादियों को किसी भी प्रकार से वंचित नहीं रखा जाए।न्याय प्रणाली में डिजिटल डिवाइड केवल तकनीक तक पहुंच और गैर-पहुंच का सवाल नहीं है, बल्कि यह सहायता प्राप्त और बिना सहायता वाले तकनीकी उपयोगकर्ताओं के बीच अधिक गंभीर रूप में सामने आता है। (खबर पढ़ें)

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