हाई कोर्ट के आदेश पर आ​पत्ति:सरकार ने 4 साल लेट अपील की, हाई कोर्ट ने माफी दी… सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें राज्य सरकार की ओर से दाखिल एक सिविल अपील में 1,612 दिन (करीब 4.5 साल) की देरी को बिना ठोस कारण दर्ज किए माफ कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि क्या हाई कोर्ट को देरी माफी (डिले कॉन्डोनेशन) से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने और स्थापित फैसलों की जानकारी थी। यह मामला भूमि/स्वामित्व से जुड़े सिविल विवाद का है। राज्य सरकार ने इस विवाद में हाई कोर्ट के पुराने फैसले के खिलाफ दूसरी अपील काफी देरी से दाखिल की थी। यह करीब साढ़े चार की देरी थी। हाई कोर्ट ने 1 सितंबर को देरी माफ कर दी, लेकिन आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इतनी लंबी देरी के लिए पर्याप्त कारण क्या था। जस्टिस जेबी पारदीवाला और पीबी वराले की बेंच ने 5 दिसंबर को दिए आदेश में कहा- “हम यह देखकर हैरान हैं कि हाई कोर्ट ने केवल मांगने भर पर 1612 दिन की देरी माफ कर दी। आदेश में यह तक नहीं बताया गया कि देरी क्यों और कैसे हुई। 1. केंद्र सरकार बनाम जहांगीर बाईरामजी इस मामले में केंद्र सरकार ने 12 साल से ज्यादा देरी से अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि देरी कितनी भी हो, हर दिन की देरी का संतोषजनक जवाब देना जरूरी है। केवल यह कहना कि सरकारी फाइलों में देरी हो गई पर्याप्त कारण नहीं है। 2. शिवम्मा बनाम कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड, पलटा था आदेश यहां एक भूमि विवाद में करीब 11 साल (3966 दिन) की देरी से अपील दाखिल की गई थी। हाई कोर्ट ने देरी माफ कर दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पलटते हुए कहा कि लिमिटेशन एक्ट की धारा-5 के तहत पूरी देरी अवधि का ठोस और तार्किक कारण देना जरूरी है। लंबी देरी को सहानुभूति के आधार पर माफ नहीं किया जा सकता। आदेश में कोविड का उल्लेख नहीं सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि देरी कोविड-19 महामारी के कारण हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट के आदेश में कोविड का कोई उल्लेख ही नहीं है। बाद में दिया गया कारण आदेश को सही नहीं ठहरा सकता। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला फिर से हाईकोर्ट को भेज दिया और निर्देश दिए कि सभी पक्षों को सुनकर कानून के अनुसार नया फैसला किया जाए।

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