सत्य का पूर्ण बोध नयों के समन्वय से संभव: जैन:कहा- स्याद्वाद का उद्देश्य सह-अस्तित्व, बौद्धिक उदारता और समन्वय की स्थापना करना

लाडनूं स्थित जैन विश्वभारती संस्थान के जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म और दर्शन विभाग द्वारा आयोजित दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के दूसरे दिन आचार्य मल्लिषेण सूरि कृत ‘स्याद्वादमंजरी’ पर गहन विद्वत् चर्चा हुई। इस अवसर पर जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जैन दर्शन के प्रख्यात विद्वान प्रो. धर्मचन्द जैन ने कारिका पांच एवं छह पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। प्रो. जैन ने स्याद्वादमंजरी की दार्शनिक गहराई, तर्क-पद्धति और समन्वयकारी दृष्टि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्याद्वाद जैन दर्शन की मौलिक और विशिष्ट देन है। कारिका पांच के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी वस्तु या सत्य का पूर्ण बोध अनेक नयों के समन्वय से ही संभव है। कारिका छह की व्याख्या करते हुए प्रो. जैन ने बताया कि स्याद्वाद का उद्देश्य विरोध या टकराव नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व, बौद्धिक उदारता और समन्वय की स्थापना करना है। प्रो. जैन ने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि स्याद्वाद केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक जीवन में संवाद, सहिष्णुता और सामाजिक समरसता का मार्ग भी प्रशस्त करता है। उन्होंने आधुनिक संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि आज के वैचारिक टकरावों के युग में स्याद्वाद एक संतुलित, समावेशी और समन्वयकारी दृष्टिकोण प्रदान करता है। इससे पूर्व प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन ने स्याद्वादमंजरी की विषयवस्तु पर विस्तृत व्याख्यान दिया। व्याख्यान सत्र के दौरान शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे, जिनका समाधान वक्ताओं ने तर्कपूर्ण एवं सरल शैली में किया। इस कार्यक्रम में राजस्थान संस्कृत अकादमी की पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुषमा सिंघवी भी विशेष रूप से उपस्थित रहीं। कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने स्वागत वक्तव्य दिया और बताया कि आगामी दिनों में स्याद्वादमंजरी की अन्य कारिकाओं पर भी विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा विस्तार से चर्चा की जाएगी। कार्यक्रम का संयोजन इर्या जैन ने किया।

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