संयुक्त राष्ट्र विश्व जनसंख्या डैश बोर्ड 2023 के अनुसार भारत की जनसंख्या 142.86 करोड़ हो गई है। साल 2040 तक यह 163 करोड़ हो सकती है। ऐसे में भविष्य में खेती के लिए जमीन कम बचेगी। इसकी चिंता की है, नीमच के चौथी पास किसान भगतराम भाटी ने। वह कहते हैं कि आने वाले समय में जमीन नहीं होगी, तो टेक्नीक तो लगानी पड़ेगी। नीमच जिले के आमलीखेड़ा गांव के भगतराम अपने 5 बीघा खेत में सब्जी से लेकर फल, बागवानी, इलायची, बादाम और औषधीय फसलें उगा रहे हैं। खास बात है कि उन्होंने जमीन का छोटा सा टुकड़ा भी खाली नहीं छोड़ा। हर हिस्से में कुछ ना कुछ फसल उगाई है। रोजाना तीन से चार हजार रुपए भी कमा रहे हैं। इसके लिए खुद दिनभर खेत में पसीना बहाते हैं। नतीजा, गर्मी के दो महीने छोड़ साल भर एक के बाद एक उत्पादन लेते हैं। आसपास के लोग भी उनके यहां सीखने आते हैं। तकनीक का प्रयोग कर पैसा कमाया जा सकता है
भगतराम भाटी का कहना है कि जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में खेती के लिए जमीन कम पड़ती जा रही है। रोजगार की समस्या भी हो रही है। इससे आने वाली पीढ़ी कैसे पेट भरेगी? कम जमीन में किस तरह अधिक मुनाफा लिया जा सकता है, इसके लिए तकनीक तो लगानी पड़ेगी, तभी गुजारा हो पाएगा। आजकल युवा खेती से दूर हो रहे हैं। तकनीक का प्रयोग कर और दिमाग लगाकर खेती से पैसा कमाया जा सकता है। शुरुआत में यूट्यूब पर खेती से संबंधित वीडियो देखे, इसी के साथ नया करने के बारे में सोचा। वैसे तो, शुरुआत से खेती कर रहे हैं, लेकिन यह प्रयोग करीब 4 साल पहले शुरू किया। जैसे, मैंने यह बगीचा लगाया, अब इसमें कलम करके नर्सरी तैयार हो गई है। एक बीघा में नर्सरी बन जाती है, इससे हजारों पेड़ तैयार हो जाएंगे। आमदनी भी शुरू हो जाएगी। खेत में पहले मिर्च लगाई, फिर सफेद मूसली लगाई। हालांकि मिर्च थोड़ी खराब हो गई थी। इसके बाद धनिया लगाया, जिससे उत्पादन हो रहा है। करेले के बीज भी लगाए हैं, धनिया खत्म होते-होते वह उत्पादन देने लग जाएगी। इसी तरह, पहले मक्का लगाया, उसके खत्म होने से पहले ही मटर लगा दी थी। मटर उत्पादन दे रही है। भिंडी भी लगा दी है, इसके खत्म होते-होते उत्पादन देने लगेगी। भगतराम ने अपने खेत को चार हिस्सों में बांटा
भगतराम बताते हैं कि पांच बीघा खेत को चार हिस्सों में बांटा है। इसमें दो बीघा में अमरूद, अंगूर, चीकू, संतरा, आम, पपीता, नींबू लगाए हैं। अब बादाम, इलायची, अंगूर, एपल बेर, अंजीर के पड़े भी लगाए हैं। इसमें अंजीर और एपल बेर में फल आ गए हैं। दूसरे हिस्से में बारिश में मक्का लगाया। मक्का कटने के साथ नीचे की ओर मटर लगाई। इसका उत्पादन वर्तमान में ले रहे हैं। इसके साथ भिंडी भी लगा दी है। मटर खत्म होने से पहले भिंडी उत्पादन देने लगेगी। इसी तरह, तीसरे हिस्से में बारिश के समय मिर्च बोई थी। उत्पादन शुरू होने से साथ पाल पर बीच में सफेद मूसली और धनिया पत्ती लगा दी। वर्तमान में तीनों उपज उत्पादन दे रही हैं। अब क्यारी में पानी देने की जगह पर करेले के बीज लगाए हैं। आने वाले दिनों उत्पादन मिलने लगेगा। भगतराम का अनुमान है कि करीब दो लाख रुपए की सफेद मूसली निकल आएगी। अब तक एक लाख रुपए की धनिया-मिर्च बेच चुका हूं। भगतराम का कहना है कि खेत के आखिरी हिस्से में डॉलर चने भी बो रखे हैं। चने की फसल जब डेढ़ महीने की हुई, तब इसके बीच में इसबगोल बो दी। चने की फसल कट जाएगी, तब तक इसबगोल तैयार हो जाएगी, जिससे एक ही समय में दो फसल का उत्पादन मिलेगा। खेत के एक हिस्से में बागवानी कर रखी है, जिसमें कई प्रजाति के फलदार वृक्ष लगाए हैं। आम की करीब 20 से 25 किस्में हैं, जिनमें छोटे-बड़े 200 पेड़ हैं। इसी तरह, संतरे के करीब 50 पेड़ हैं। अमरूद के भी करीब 25 पौधे हैं। खेत की मेढ़ पर भी लगाए पपीते के पौधे
भगतराम ने खेत के चारों तरफ मेढ़ पर करीब 250 पपीते के पेड़ उस जगह लगाए हैं, जहां ट्रैक्टर से जुताई नहीं हो सकती। यह हिस्सा अछूता रहता है। पिछले तीन साल से इससे फल भी ले रहे हैं। यही नहीं, पपीते के पौधों के बीच में खेत की तार फेंसिंग कर चारों तरफ गराडू, गिलकी, शकरकंद लगा दी है। भगत राम बताते हैं कि गर्मी के दो-तीन महीने में उपज नहीं लेते। इस दौरान जरूरी जुताई के साथ देसी खाद व अन्य उर्वरकता बढ़ाने वाले उत्पाद डालते रहते हैं, ताकि उपजाऊ क्षमता बनी रहे। भगतराम का कहना है कि वैसे तो फसलों के लिए पर्याप्त पानी है, लेकिन फिर भी स्प्रिंकलर के जरिए सिंचाई करते हैं। इससे जरूरत अनुसार पानी उपलब्ध होता है। पानी की बरबादी भी नहीं होती। अब सीखने आते हैं युवा छात्र, मार्गदर्शन लेते हैं
भगतराम रोजाना करीब तीन से चार हजार रुपए की फसल मंडी में बेचने ले जाते हैं। वहां से लौटकर खेत के काम में जुट जाते हैं। साथ में सिर्फ उनकी पत्नी मदद करती है। तीनों बेटों को बंटवारा कर दिया है, ताकि आत्मनिर्भर हो सकें। वे समय-समय पर पिता का मार्गदर्शन लेते रहते हैं। अपने लिए पांच बीघा खेती रखी है। भगतराम बताते हैं कि करीब 10-15 साल पहले 8 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज था, लेकिन मेहनत से वह भी चुका दिया। भगतराम बमुश्किल चौथी क्लास तक पढ़े हैं। खास बात ये भी है कि न तो कहीं प्रशिक्षण लिया और न किसी का मार्गदर्शन। इसके बावजूद उनके पास स्मार्ट खेती के गुर सीखने एग्रीकल्चर के छात्र भी आते हैं। पड़ोसी और गांव के युवा किसान भी देखने आते हैं। खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें- मैक्सिको के चिया सीड्स नर्मदापुरम में उगा रहे मैक्सिको में होने वाली चिया सीड्स की खेती अब नर्मदांचल की धरती पर भी हो रही है। नर्मदापुरम में मिसरोद के किसान प्रमोद दुबे ने चिया सीड का उत्पादन कर न केवल अपनी आय को दोगुना किया है बल्कि रोल मॉडल किसान के रूप में पहचान भी बनाई है। पढ़ें पूरी खबर…


