हाईकोर्ट की रीवा कलेक्टर को फटकार:कहा-आपका काम जनता की सेवा; किसान को 30 साल बाद मिली अधिग्रहित जमीन, 25 हजार का जुर्माना भी

मध्यप्रदेश के रीवा जिले के किसान राकेश तिवारी को हाईकोर्ट से 32 साल बाद राहत मिली है। कोर्ट ने किसान की लड़ाई को जायज मानते हुए जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई और कलेक्टर पर 25 हजार रुपए की कास्ट भी लगाई। दरअसल, राकेश तिवारी की जमीन पर जिला प्रशासन ने जबरन अधिग्रहण कर लिया था। इतना ही नहीं, नोटिस भी तब भेजा गया जब किसान अपने घर पर नहीं था। आनन-फानन में किसान की करीब सवा एकड़ जमीन को हाउसिंग बोर्ड सोसाइटी के हवाले कर दिया गया। किसान ने रीवा के कलेक्टर और कमिश्नर से कई बार अपनी जमीन को लेकर राहत की अपील की, लेकिन उसे कोई सुनवाई नहीं मिली। आखिरकार, राकेश तिवारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे न्याय मिला। किसान की पैतृक जमीन; खेती से गुजर-बसर राकेश तिवारी की कहानी एक संघर्ष की मिसाल है। उनके पास सवा एकड़ पैतृक जमीन है, जिस पर वह खेती करके अपना जीवन यापन करते हैं। 1993 में रीवा हाउसिंग बोर्ड ने घोषणा की थी कि राकेश तिवारी की जमीन पर एक कॉलोनी बनाई जाएगी, और इसे जबरन अधिग्रहित कर लिया गया। हैरानी की बात यह थी कि इस निर्णय के बारे में न तो हाउसिंग बोर्ड ने राकेश तिवारी को सूचित किया और न ही राजस्व अधिकारी उनके पास आए। इसके अलावा, राकेश तिवारी को इस अधिग्रहण के बदले कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया। 2015 में राकेश तिवारी को हाउसिंग बोर्ड से एक नोटिस मिला, जिसमें कहा गया कि वह अपनी जमीन छोड़ दें और मकान खाली कर दें, क्योंकि अब यह जमीन हाउसिंग बोर्ड की संपत्ति बन चुकी है। इस नोटिस का जवाब देते हुए राकेश तिवारी ने हाउसिंग बोर्ड को यह स्पष्ट किया कि जब तक उन्हें इस जमीन का मुआवजा नहीं दिया जाता, वह इसे नहीं छोड़ेंगे। सात दिन बाद हाउसिंग बोर्ड ने दूसरा नोटिस जारी किया, जिसमें लिखा था कि यदि उन्होंने जमीन खाली नहीं की तो उन्हें जबरन वहां से हटा दिया जाएगा। किसान पहुंचा हाईकोर्ट रीवा जिले के किसान राकेश तिवारी ने अपनी जमीन पर जिला प्रशासन द्वारा किए गए जबरन अधिग्रहण के खिलाफ मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट में दावा किया कि उन्हें और उनके परिवार को बेदखल किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने राकेश तिवारी के पक्ष में अंतरिम आदेश दिया, जिसमें कहा गया कि इस मामले की अंतिम सुनवाई तक राकेश तिवारी को उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जाएगा। यह मुकदमा 2015 से 2023 तक चलता रहा। हाउसिंग बोर्ड ने तो अपना जवाब दे दिया, लेकिन राजस्व विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं आया। किसान के वकील राजेंद्र सिंह ने कोर्ट में बताया कि जमीन का अधिग्रहण राजस्व विभाग के दायरे में आता है, इसलिए इस संबंध में विभाग की कार्यवाही और मुआवजा देने की जानकारी हाईकोर्ट ने मांगी। जब रीवा कलेक्टर से यह जानकारी मांगी गई, तो वह इसे देने में असमर्थ रहे, जिसके बाद कोर्ट ने तत्कालीन कलेक्टर पर 10,000 रुपए का कास्ट लगाया। जिला प्रशासन नहीं दे पाया जवाब मामले में 6 जनवरी 2025 को एक बार फिर सुनवाई हुई। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल ने राज्य सरकार के एडवोकेट से सवाल किया कि इस मामले में राजस्व विभाग ने राकेश तिवारी को कितना मुआवजा दिया, और अधिग्रहण की क्या प्रक्रिया अपनाई गई। इन सभी बिंदुओं को रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए कहा गया, लेकिन शासन की ओर से दस्तावेज पेश नहीं किए गए। जस्टिस अग्रवाल ने आदेश दिया कि 7 जनवरी को रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल को इस मामले से जुड़े कागजात लेकर कोर्ट में उपस्थित होना होगा। हालांकि, कलेक्टर ने कोर्ट में एक आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया कि उनके पति बीमार हैं, इसलिए वह कोर्ट नहीं आ सकतीं। इस आवेदन को जस्टिस अग्रवाल ने खारिज करते हुए कलेक्टर को कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने कहा, ‘आपका काम गैर जिम्मेदाराना है, आपके अधिकार जनता की सेवा करने के लिए दिए गए हैं।’ इसके बाद, 7 जनवरी को लंच के बाद कलेक्टर प्रतिभा पाल भू-अधिग्रहण से जुड़े कागजात लेकर कोर्ट में उपस्थित हुई। कोर्ट ने कलेक्टर से इस मामले में और भी कड़ी कार्रवाई की उम्मीद जताई। कलेक्टर पर 25 हजार रुपए की कास्ट, जमीन वापस 8 जनवरी को किसान राकेश तिवारी की जमीन से संबंधित मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी की। जस्टिस विवेक अग्रवाल ने राज्य सरकार और रीवा कलेक्टर से पूछा कि उन्होंने राकेश तिवारी को कब मुआवजा दिया, लेकिन दोनों पक्ष इसका स्पष्ट जवाब देने में असमर्थ रहे। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने आदेश दिया कि राकेश तिवारी को उसकी जमीन वापस दी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जिला प्रशासन फिर से जमीन चाहता है, तो उसे नई अधिसूचना जारी करनी होगी और नए दरों के अनुसार किसान को मुआवजा देना होगा। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल पर 25 हजार रुपए की कास्ट भी लगाई, क्योंकि वह इस मामले में सही तरीके से जानकारी नहीं दे पाए और मुआवजे के बारे में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

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