जल का स्वभाव संत के मन जैसा निर्मल और शीतल होता है : विभाश्री

सिटी रिपोर्टर | रांची हर एक इंसान की समस्या है गुस्सा आए, तो क्या करें? अगर आपने अपने गुस्से को अंदर के अंदर में दमन कर लिया तो वहीं अंदर ही अंदर भड़कता रहेगा, फिर एक बड़ा बिस्फोट बन कर बाहर निकलेगा। अगर अंदर में गुस्सा भड़क रहा है, गुस्सा आ रहा है तो उसको निकाल दें। अब सवाल है कि किसके ऊपर निकाले? । आर्यिका विभाश्री माता ने श्रोताओं से कहा कि जिनका संत स्वभाव हो, उनके पास जाकर हम अपना गुस्सा निकाल सकते हैं। गणाचार्य 108श्री विराग सागर महाराज की शिष्या आर्यिका 105 श्री विभाश्री माता इंदौर जाने के क्रम में रांची के दिगंबर जैन मंदिर अपर बाजार में प्रवास पर हैं। शुक्रवार की सुबह धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि माताश्री ने कहा कि संत होना और संत स्वभाव होना, दोनों अलग-अलग बात है। संत स्वभाव का मतलब क्या है? यदि कोई दुर्जन संत को हानि पहुंचाता है, तब भी संत किसी को हानि नहीं पहुंचाते हैं। इसको कहते हैं संत स्वभाव। माताश्री ने श्रोताओं से पूछा कि भगवान की पूजा करते समय सबसे पहले जल ही क्यों अर्पण करते है? जवाब देते हुए आर्यिका विभाश्री माता ने कहा कि जल का स्वभाव संत के मन जैसा निर्मल और शीतल होता है। जैसे जल को अगर अग्नि के ऊपर डाल लिया जाए, तो जल अग्नि को जलाता नहीं, प्रज्वलित नहीं करता है। जल अग्नि को शांत करने का काम करता है। जब तक हम जल की तरह नहीं बन पाएंगे तब तक हमारे जन्म बुढ़ापा मृत्यु का नाश नहीं हो सकता। हम भगवत पद को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जल का स्वभाव संत स्वभाव है। धर्मसभा का संचालन मंत्री पंकज पांड्या ने किया। धर्मसभा में श्री दिगंबर जैन पंचायत के पदाधिकारी और सैकड़ों की संख्या में समाज के पुरुष-महिलाएं और युवा-युवतियां भी मौजूद थीं।

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