’12 साल की गुनगुन (बदला हुआ नाम) को गरीबी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा। गांव का एक दलाल मजदूरी करवाने उसे गुजरात ले गया। इसके बदले वो उसके घरवालों को हर महीने 1500 रुपए भेजता रहा। करीब 1 साल बाद घर लौटी गुनगुन ने जो हकीकत बयां की उसे सुनकर हर किसी की रूह कांप गई। एजेंट ने उसे जिस फार्म हाउस मालिक को मजदूरी के लिए सौंपा था, वो सालभर उसके साथ दरिंदगी करते रहा। इतने जख्म दिए कि मर्दों को देखते ही वो खौफ खाने लगती। 2 साल तक घर की चारदीवारी से बाहर तक नहीं निकल पाई।’ गुनगुन की तरह राजस्थान के गरीब आदिवासी इलाकों के सैकड़ों-हजारों बच्चे दलालों के चंगुल में फंसकर ऐसा ही दंश झेल चुके हैं। स्पेशल सीरीज के पहले पार्ट में ऐसे दलालों को कैमरे के आगे बेनकाब किया था (CLICK कर पढ़ें)। आज पार्ट-2 में उनके शिकार हुए बच्चों की दर्दनाक कहानी… केस 1 : फार्म हाउस के नाम पर ले गया, 12 साल की बच्ची से एक साल तक रेप
उदयपुर की झाड़ोल तहसील के एक गांव की रहने वाली गुनगुन सरकारी स्कूल की छठी क्लास में पढ़ती थी। उसी स्कूल के टीचर रहे दुर्गाराम चौधरी ने बताया कि एक एजेंट छात्रा को गुजरात में फार्म हाउस में मजदूरी के लिए ले गया था, लेकिन वहां उस बच्ची को साथ जो हुआ वो सुनकर मैं दंग रह गया। मेरे स्कूल की स्टूडेंट थी, एक साल बाद घर लौटने पर मैं उस बच्ची से मिलने उसके घर गया। वो काफी सहमी हुई थी। छात्रा से बात की तो पता लगा कि गुजरात में मजदूरी के दौरान फार्म हाउस के मालिक के अलावा साथ काम करने वाले लोगों ने उसका शारीरिक शोषण किया था। इतना शोषण कि वो भीड़ में निकलने से घबराने लगी। उसने स्कूल जाना भी बंद कर दिया था। अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी। आम जीवन से दूर हो चली थी। मैंने परिजनों को पुलिस में शिकायत करने के लिए काफी मनाने का प्रयास किया, लेकिन बदनामी और गरीबी के कारण शिकायत करने से ही इनकार कर दिया। बच्ची के साथ हुए शारीरिक शोषण की पीड़ा सुनने के बाद मैंने दो दिन तक खाना नहीं खाया था। दोबारा उस बच्ची के घर गया कि अब उसे किसी तरीके से स्कूल से जोड़ा जाए, लेकिन तब तक उसके परिजनों ने उसकी शादी कर दी थी। केस- 2 : पिता की कैंसर से मौत हुई तो चाचा ने गुजरात मजदूरी के लिए भेज दिया
कोटड़ा के रहने वाले 11 साल के मनोज (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वो 6 भाई और बहन हैं। पिता को कैंसर था। उनके इलाज में घर का सब कुछ बिक गया। कुछ साल पहले पिता की कैंसर से मौत हो गई थी। तब हमें स्कूल छोड़ना पड़ा और एक झोपड़ी में रहना पड़ता था। मां ने हमें हमारे चाचा के भरोसे छोड़ दिया। चाचा मजदूरों की तरह काम करवाते थे। करीब दो साल पहले चाचा ने मुझे एक एजेंट के जरिए लीज पर गुजरात के अहमदाबाद भिजवा दिया था। चीकू कम तोड़ने पर सेठ हाथ-पैर बांधकर पीटता था
मनोज ने बताया कि एजेंट मुझे अहमदाबाद के एक फार्म हाउस में लेकर गया था। जहां चीकू की खेती होती थी। हर दिन हमें चीकू तोड़ने पड़ते थे। वहां का सेठ बहुत जालिम था। चीकू का शाम को वजन होता था और वजन कम होने पर हाथ-पैर बांध कर पीटता था। इसके बाद भी सजा खत्म नहीं होती थी, एक हफ्ते तक सिर्फ एक समय रात को खाना मिलता था। खाने में भी हमें सिर्फ दो रोटी देते थे। वहां हमारे रहने के लिए भी कोई जगह नहीं थी। रात को गायों के बाड़े में सोना पड़ता था। भाई की मौत का झूठा बहाना बनाकर भागा
कुछ महीनों बाद उसी फार्म हाउस पर हमारे गांव से कुछ और लोग मजदूरी करने आए थे। मुझे वहां से भागना था। मैंने मालिक को अपने भाई की मौत होने की झूठी खबर सुनाकर एक बार घर भेजने के लिए कहा। पहले तो मालिक नहीं माना। फिर कई दिनों तक मिन्नतें करने के बाद मालिक ने तीन दिन की छुट्टी दी। तब मैं वहां से भागकर अपने गांव आ गया। केस- 3 : फाइव स्टार होटल में काम दिलाने का झांसा देकर केमिकल फैक्ट्री में भेजा
उदयपुर में झाड़ोल के फलासिया गांव में बाबूलाल नाम के दलाल ने गांव के चार अलग-अलग बच्चों के माता-पिता को झांसे में लिया। कहा कि इन बच्चों को आंध्र प्रदेश की एक फाइव स्टार होटल में नौकरी लगवा देगा। वहां प्रति बच्चा एक लाख रुपए साल की सैलरी मिलेगी। दलाल 10 से 14 साल के चारों बच्चों को आंध्र प्रदेश की एक केमिकल फैक्ट्री में ले गया। वहां उन्हें जबरन काम पर लगवा दिया। बच्चों ने फोन कर कहा- हमें बचा लो नहीं तो हम जिंदा नहीं रह पाएंगे
अगस्त, 2021 में आंध्र प्रदेश के नंबर से एक बच्चे ने कॉल कर रेस्क्यू टीम को बताया कि उन्हें केमिकल फैक्ट्री में बंधक बनाकर रखा है। यहां 12 से 18 घंटे केमिकल में काम करने से तबीयत बिगड़ रही है। यहां रहे तो हम ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह पाएंगे। बच्चे शहर और फैक्ट्री का नाम तक नहीं बता पा रहे थे। केवल इतना बताया कि उन्हें कोई बाबूलाल नाम का दलाल यहां लेकर आया था। बच्चे अपने घरवालों का नाम-पता बताते उसे पहले ही फोन कट गया। वापस कई बार कॉल किया लेकिन फोन बंद आ रहा था। फैक्ट्री के मालिक से 10 साल का कॉन्ट्रैक्ट करके पांच लाख में बेच दिया था
रेस्क्यू टीम ने सबसे पहले उदयपुर के ट्राइबल एरिया में बच्चों को बेचने वाले बाबूलाल नाम के दलाल का पता लगाया। दलाल से IPS अधिकारी बनकर पूछा तो उसने कबूला कि बच्चों को आंध्र प्रदेश में एक केमिकल फैक्ट्री में 10 साल काम करवाने के लिए बेच दिया है। फैक्ट्री मालिक ने लाखों रुपए कमीशन दिया था। इसके बाद हम अपनी टीम के साथ आंध्र प्रदेश जाकर बच्चों को रेस्क्यू करवा कर लाए। उनमें से तीन बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो रखे थे। केमिकल फैक्ट्री में काम करने से उन्हें इंफेक्शन हो गया था। केस 4 : इकलौते बेटे को साड़ी शोरूम पर नौकरी का झांसा देकर बिकवाया
झाड़ोल, उदयपुर के नाल ननामा गांव में रहने वाला कान्हाराम मजदूरी करता है। दलाल चुन्नीलाल कटारा ने कान्हाराम से कहा कि वो उसके 14 वर्षीय बेटे की सूरत में साड़ी शोरूम में नौकरी लगवा देगा। हर महीने 10 हजार रुपए सैलरी और अच्छा खाना मिलेगा। झांसे में आकर कान्हाराम ने इकलौते बेटे नरेश (बदला हुआ नाम) को चुन्नीलाल के साथ सूरत भेज दिया। दलाल ने गांव के अन्य लड़कों को तो कमीशन लेकर सूरत में काम पर लगा दिया, लेकिन नरेश को वापी के गुन्दलाव में होटल मालिक को बेच दिया। करीब 15 से 20 दिन बाद गांव के बाकी लड़के गांव लौट आए, लेकिन नरेश नहीं लौटा। कान्हाराम ने दलाल को कॉल करके पूछा तो बहाना बनाता रहा। फिर कहा- कुछ लोग उसके बेटे का अपहरण करके ले गए। यह खबर सुन कान्हाराम उसकी तलाश में सूरत भागा, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला। डिप्रेशन में अपना नाम तक भूला
उधर, होटल मालिक ने खरीदने के बाद सबसे पहले नरेश का आधार कार्ड छीना। नाम बदल कर मोहनराम करवा दिया। कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंट ढोने का काम दे दिया। 15 से 16 घंटों तक काम करवाया जाता था। ज्यादा वजन उठाने से बीमार पड़ने लगा तो उसे होटल में सफाई और बर्तन धोने के काम पर लगा दिया। नरेश ने रात के समय तीन बार भागने की कोशिश की। हर बार पकड़ा गया। अब होटल मालिक ने टॉर्चर करना शुरू कर दिया। रातभर एक कमरे में बंद करके रखते और एक समय खाना दिया जाता। टॉर्चर से नरेश इतना तनाव में आ गया कि अपना असली नाम-पता ही भूल गया। इकलौते बेटे को ढूंढने के लिए जमीन गिरवी रख लोन लिया
नरेश एक साल तक नहीं लौटा तो कान्हाराम ने उसे ढूंढने के लिए जमीन गिरवी रख दी। गुजरात जाकर काफी जगह तलाशा, लेकिन पता नहीं चला। इस बीच कान्हाराम ने टीचर दुर्गाराम से संपर्क किया। बेटे के लापता होने की पूरी कहानी बताई। रेस्क्यू टीम ने नरेश को ढूंढने के लिए उसकी एक फोटो के साथ पिता कान्हाराम की अपील का वीडियो सब जगह सर्कुलेट किया। एक राहगीर ने सूचना दी कि नरेश जैसे दिखने वाले एक बच्चे को गुजरात के वापी में होटल पर काम करते देखा है। इस पर मैंने राहगीर से नरेश की फोटो भेजने के लिए कहा। फोटो दिखाते ही कान्हाराम पहचान गया कि वो उसका बेटा नरेश ही है। होटल के नंबरों पर कॉल कर नरेश से बात हुई। वहीं से पता चला कि मालिक उसे किसी दूसरी जगह शिफ्ट करने वाला है। नरेश से किसी ट्रक ड्राइवर से फोन पर बात करवाने के लिए कहा। रेस्क्यू टीम ने ट्रक ड्राइवर को नरेश को राजस्थान लाने की रिक्वेस्ट की। खुशकिस्मती से ट्रक भी राजस्थान आ रहा था। इस तरह एक ट्रक वाले की मदद से नरेश को रेस्क्यू किया। परिजन खुद दोषी, इसलिए दलालों के खिलाफ नहीं करते शिकायत
नागौर के डेगाना निवासी दुर्गाराम चौधरी (37) सरकारी टीचर हैं। अपनी 16 साल की नौकरी में वे 1500 से ज्यादा बच्चों को रेस्क्यू करवा चुके हैं। उन्होंने बताया कि उदयपुर, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा से छोटी उम्र में ही बच्चों को दलाल लीज पर ले जाते हैं। इन्हें लोकल भाषा में मेट बोलते हैं। काम दिलाने के बदले दलाल उनकी कमाई का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा अपना कमीशन लेते हैं। जहां बच्चों को बेचा जाता है, उनसे भी उतना ही कमीशन लेते हैं। कई बच्चे सालों तक घर नहीं लौट पाते। उन परिस्थितियों में परिजन पुलिस में दलाल के खिलाफ शिकायत भी नहीं कर पाते हैं। क्योंकि अपने नाबालिग बच्चे को दलाल के हवाले करने के वे खुद भी जिम्मेदार होते हैं। दलाल भी उन्हें खुद फंसाने का डर दिखाते हैं। यही कारण है कि ऐसे दलाल कानून की पकड़ से दूर ही रहते हैं। अगर कानूनी पकड़ बनाई जाए तो ऐसे दलालों को सजा दिलाई जा सकती है। क्या कहता है कानून?
राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट एके जैन के मुताबिक ‘बालश्रम (निषेध और नियमन) कानून 1986’ के मुताबिक 14 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह के शारीरिक श्रम यानी मजदूरी करवाना जुर्म है। मजदूरी कराने पर माता-पिता के खिलाफ भी इस एक्ट में 2 साल की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माना का प्रावधान है। हर महीने चार जिलों से 500 से ज्यादा बच्चों को बेच देते हैं दलाल
बच्चों को रेस्क्यू करने वाले टीचर दुर्गाराम ने बताया कि राजस्थान के उदयपुर, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले की बॉर्डर गुजरात को टच करती है। इन चारों जिलों के ट्राइबल एरिया में दलाल सबसे ज्यादा सक्रिय है। दलाल हर महीने 500 से ज्यादा बच्चों का सौदा करके उन्हें मजदूरी के लिए बिकवा देते हैं। इनमें सबसे ज्यादा बच्चे गुजरात जाते हैं। इन बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह जीपों में भरकर रात को गुजरात ले जाया जाता है। सौदेबाजी सबसे ज्यादा अगस्त से नवंबर महीने और फरवरी से मार्च महीने में होती है। इन महीनों में गुजरात में फैक्ट्रियों के अलावा फसलों की बुवाई-कटाई के लिए भी बच्चों की सप्लाई होती है। बच्चों को बचाने के लिए 2 हजार इनफॉर्मर का नेटवर्क बनाया
दुर्गाराम चौधरी ने बताया कि उन्होंने उदयपुर के ट्राइबल एरिया में बच्चों की दलाली करने वाले एजेंटों के पूरे नेटवर्क का पता लगाया। हर गांव में जागरूक लोगों, पंच, टीचर, आशा सहयोगिनी को अपना इनफॉर्मर (खबरी) बनाया। कई बार बच्चों को रेस्क्यू करने के दौरान हमलों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में 10 से 15 लोगों की अलग टीम बनाई। इस काम के लिए साल 2022 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा राजस्थान पुलिस सम्मान, राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार, शहीद नानाभाई खांट शिक्षक गौरव पुरस्कार जैसे कई अवॉर्ड से सम्मानित हो चुके हैं। कभी तस्करों के बंधक थे,अब जिले के टॉपर हैं यह बच्चे
नेताजी सुभाष चंद्र बोस राजकीय उच्च प्राथमिक आवासीय स्कूल, लई का गुढ़ा में जब दुर्गाराम चौधरी की ड्यूटी लगी तो उन्होंने सरकारी स्कूल की काया ही पलट दी। कभी तस्करों के बंधक रहे बच्चे और लावारिस बच्चों को उन्होंने यहां पढ़ाना शुरू किया। दुर्गाराम ने बताया कि रेस्क्यू करने के बाद सबसे बड़ी समस्या होती थी, अधिकतर बच्चों के मां-बाप नहीं होते थे या फिर उनको फिर से बेचना का खतरा रहता था। इसलिए उन्होंने ऐसे बच्चों को हॉस्टल में रखकर पढ़ाना शुरू किया। अभी यहां 100 से ज्यादा बच्चे हैं। इनमें से कई बच्चों जिले के टॉपर हैं तो कई खेलों में टॉप कर रहे हैं। शहरों के लोग अब इन बच्चों के साथ अपना बर्थडे सेलिब्रेशन करने आते हैं, ताकि वो इन बच्चों के साथ खुशी के पल बिता सकें।


