पीली हो जाएगी गुलाबी नगरी, बिना झीलों का उदयपुर:दिनभर धूल के तूफान, बिना मास्क सांस नहीं, AI से देखिए अरावली खत्म होने के खतरे

झीलों की नगरी उदयपुर में टूरिस्ट नहीं आएंगे। क्योंकि झीलों में पानी नहीं सिर्फ सूखे की दरारें होंगी। गुलाबी नगरी जयपुर का रंग धूल से पीला हो जाएगा। सूर्यनगरी जोधपुर में तापमान 50 डिग्री पहुंच जाएगा। लू-आंधी के कारण सांस के रोगी इतने बढ़ जाएंगे कि अस्पताल कम पड़ जाएंगे। आना सागर वाले अजमेर में पानी शॉपिंग मॉल में बिकेगा। एजुकेशन सिटी कोटा में बच्चों को ऑक्सीजन मास्क लगाकर स्कूल जाना पड़ेगा। सरिस्का में जंगल नहीं होगा। टाइगर सिर्फ तस्वीर में नजर आएगा। अभी शायद आपको ऊपर लिखी लाइनें मजाक लग रही होंगी, लेकिन कुछ साल बाद नहीं लगेंगी। राजस्थान से अरावली की पहाड़ियां खत्म हो गईं तो यहीं मजाक डरावनी हकीकत बनकर सामने आ सकता है। अरावली खत्म होने की बात हम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि एक नई परिभाषा के अनुसार 100 मीटर से ऊंची पहाड़ी को ही अरावली माना जाएगा। ये परिभाषा ‘पहाड़ियों को काटने वालों के लिए एक वैध हथियार’ बन जाएगी। भास्कर की स्पेशल सीरीज में जानिए क्यों अरावली सिर्फ पर्वत श्रंखला नहीं, हमारी लाइफ लाइन है। पहले देखिए, अरावली राजस्थान और पूरे भारत के लिए क्यों बेहद महत्वपूर्ण है? आज पहले पार्ट में देखिए AI की मदद से बनानी गई भविष्य की डरावनी तस्वीरें… खतरा 1 : मास्क बन जाएगा जिंदगी का हिस्सा एनवायरमेंट एक्सपर्ट डॉ. एसएस पूनिया के अनुसार, अरावली रेगिस्तान की रेत को रोकती है। अरावली पर संकट आया तो रेगिस्तान की महीन रेत सीधे हमारे शहरों तक पहुंचेगी। हवा में हर समय धूल रहेगी। सांस लेने के लिए ऑक्सीजन मास्क ही एकमात्र विकल्प होगा। जहां भी जाएं ऑक्सीजन मास्क और सिलेंडर साथ लेकर जाना पड़ेगा। खतरा 2 : सांस के इतने मरीज कि हॉस्पिटल कम पड़ जाएंगे दिल्ली का करीबी राज्य होने के कारण राजस्थान में प्रदूषण लेवल हर साल बढ़ रहा है। अरावली नहीं होने पर ये खतरा और बढ़ जाएगा। हवा में PM2.5 और PM10 कण बढ़ेंगे, जिससे सांस लेना मुश्किल होगा। लगातार धूल प्रदूषण से अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियां तेजी से बढ़ेंगी। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा खतरा होगा। मरीज की संख्या बहुत ज्यादा होगी और हॉस्पिटल की कम। खतरा 3 : खत्म हो जाएंगे जंगल, तस्वीरों में दिखेगा टाइगर अरावली ही जंगलों का आधार है। अरावली खत्म होने से मिट्टी कटाव बढ़ेगा, नमी घटेगी और बारिश कम होगी। बिना पानी और स्थिर जमीन के जंगल पनप नहीं पाएंगे। जंगल खत्म हुए तो वन्यजीव भी खत्म हो जाएंगे। टूरिस्ट के लिए टाइगर रिजर्व में कुछ नहीं बचेगा। खतरा 4 : न झीलें बचेंगी, न टूरिस्ट आएंगे अरावली खत्म होने से झीलों का कैचमेंट और भूजल रिचार्ज नष्ट हो जाएगा। बारिश का पानी रुकने के बजाय बह जाएगा। नालों-धाराओं का प्रवाह टूटेगा। जंगल खत्म होने से बारिश घटेगी। बढ़ी गर्मी से वाष्पीकरण बढ़ेगा, जिससे झीलें धीरे-धीरे पूरी तरह सूख जाएंगी। खतरा 5 : जमीन हो जाएगी बंजर, कैसे करेंगे खेती अरावली खत्म होने से बारिश अनियमित हो जाएगी। पानी जमीन में नहीं रुकेगा। भूजल रिचार्ज बंद होगा। मिट्टी कटाव और रेत फैलने से उपजाऊ जमीन बंजर हो जाएगी, जिससे खेती करना असंभव हो जाएगा। खतरा 6 : पानी की किल्लत, खरीदकर पीना पड़ेगा अरावली खत्म होने से मानसूनी हवाएं बिना रुके आगे निकल जाएंगी, जिससे स्थानीय बारिश घटेगी। इसके अलावा जंगल खत्म होने से हवा में नमी कम होगी और बादल बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी। बढ़ते तापमान और सूखे माहौल के कारण बारिश अनियमित होगी, जिससे लंबे सूखे और अचानक बाढ़ जैसी स्थितियां बनेंगी। खतरा 7 : तापमान बढ़ेगा, दिनभर धूल के तूफान अरावली राजस्थान के लिए सुरक्षा की दीवार है। ये रेगिस्तान से आने वाली गर्म, धूल भरी हवाओं को रोकती हैं। अरावली खत्म होने पर तेज हवाएं बिना रुकावट आगे बढ़ेंगी। दिनभर धूलभरी आंधियां चलेंगी। इसके अलावा हरियाली घटने से बारिश कम होगी और गर्मी बढ़ेगी। हीटवेव का असर बढ़ेगा। इसलिए बढ़ गई अरावली को लेकर चिंता 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी देने के बाद 15 जिलों यानी करीब आधे राजस्थान में चिंता गहरा गई है। यह नई परिभाषा कहती है कि आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृति को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। इस मानक से अरावली की 90% से ज्यादा पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिसका सीधा असर खनन, रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों पर पड़ेगा। छोटी पहाड़ियां बड़े काम की पर्यावरण विशेषज्ञ व झील संरक्षण समिति के पूर्व सदस्य डॉ. अनिल मेहता के अनुसार, छोटे टीले, रिज क्षेत्र और पहाड़ियों का नेटवर्क ही पर्यावरण संतुलन बनाए रखता है। अरावली की यही छोटी पहाड़ियां हवा के भारी प्रवाह को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और तापमान नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। यदि इन्हें कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया तो आने वाले वर्षों में पारिस्थितिक संतुलन भी डगमगा सकता है। 90% पहाड़ियां अरावली से बाहर हो जाएंगी 100 मीटर वाली परिभाषा ‘पहाड़ियों को काटने वालों के लिए एक वैध हथियार’ बन जाएगी। भारतीय वन सर्वेक्षण के आकलन के मुताबिक प्रदेश के 15 जिलों में मौजूद 12 हजार 81 अरावली पहाड़/टीले 20 मीटर या उससे अधिक ऊंचे हैं, लेकिन इनमें से केवल 1 हजार 48 ही ऐसे हैं जो 100 मीटर से ज्यादा ऊंचे हैं। यानी 11 हजार 33 संरचनाएं अरावली नहीं कहीं जा सकेंगी। 20 मीटर ऊंचाई का मानक इसलिए अहम माना जाता रहा है, क्योंकि इतनी ऊंचाई की पहाड़ियां भी हवा के प्रवाह को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार का काम करती हैं। …. कल पढ़िए : अरावली न हो तो पाकिस्तान में बरसेगा राजस्थान का मानसून : 1.50 लाख से ज्यादा पहाड़ियों पर खनन का खतरा, अब तक करीब 25% चोटियां खत्म

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