राजनीति और चमत्कारी बाबाओं के बीच गठबंधन नई बात नहीं है। केंद्र से लेकर प्रदेशों की राजनीति तक चमत्कारी बाबाओं की शरण में जाने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त रही है। अब भी कमी नहीं है। पिछले कई दिनों से राजधानी के पड़ोस वाले जिले के एक चमत्कारी बाबा को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाएं हो रही हैं। बाबा को एक नेताजी के रिश्तेदारों की ओर से करोड़ों की लग्जरी कार भेंट करने की बातें चल रही है। पड़ोसी राज्य के बुजुर्ग नेताजी के रिश्तेदार ने मनोकामना पूरी होने पर बाबा को श्रद्धा के तौर पर कार भेंट की है। मामला पहले बाबाजी और श्रद्धालुओं के बीच का ही था, लेकिन महंगे प्रसाद छिपते थोड़े ही है। बातें सियासी गलियारों तक पहुंच गई है। सत्ता वाली पार्टी के बड़े बैनर में किससे हुई चूक
सियासत में नाम और फोटो का बहुत महत्व होता है। एक फोटो के होने न होने से मायने बदल जाते हैं। पिछले दिनों सत्ता वाली पार्टी के दफ्तर के बाहर बड़ा सा बैनर लगा। इसमें पार्टी के बड़े नेताओं के फोटो लगाए, लेकिन इसमें बड़ी गलती हो गई। पूर्व उपराष्ट्रपति और प्रदेश के मुखिया रह चुके दिवंगत दिग्गज नेता का फोटो ही नहीं लगाया। बैनर लगने के बाद यह चूक कई नेताओं ने पकड़ी तो जिम्मेदार नेताओं के सामने नाराजगी जताई। जिम्मेदारों ने तत्काल भूल सुधार करते हुए बैनर में जहां कमल लगा था, वहां दिवंगत दिग्गज नेता का फोटो लगाया। इसलिए सयाने लोग कह गए हैं हर काम पांच आदमियों से पूछकर ही करना चाहिए। कहां गर्म हुआ जरदारी टैक्स का मामला?
सरकार का एक महकमा इन दिनों समाज सेवा करने वालों के निशाने पर है। समाज सेवा करने वालों का फंड रुका हुआ है। पिछले दिनों कुछ समाज सेवा करने वाले एक नेता के यहां फरियाद लेकर गए हुए थे। बातों ही बातों में महकमे के बदले हुए हालात को लेकर खूब बरसे। बात शुरू हुई तो जरदारी टैक्स तक पहुंच गई। समाज सेवा वालों ने कमीशन को जरदारी टैक्स नाम दे रखा है। किसी जमाने में पड़ोसी मुल्क के एक पावरफुल नेता दस प्रतिशत कमीशन के लिए बदनाम थे। उनके नाम पर कमीशन का यह नाम यहां भी पहुंच गया। समाज सेवा वालों ने संस्थाओं को जारी होने वाली ग्रांट के बदले जरदारी टैक्स देने का दावा किया तो नेताजी भी आवाक रह गए, क्योंकि अनाथ, निराश्रित के लिए काम करने वाली संस्थाओं को तो मुक्त ही रखा जाता है। कोई भी जिम्मेदार इस सेक्टर से कुछ लेने की नहीं सोच सकता,आखिर कहीं तो दया भी की जाती है, लेकिन अब परंपरा टूटने से बात दूर तक चली गई है। इसे लेकर दस्तावेज और लेटर तक बड़ी जगह भेजे गए हैं, इसके साइड इफैक्ट भी जल्द सामने आ सकते हैं। खुद की पोजिशन ठीक करने की कोशिश में मंत्री
सत्ता के केंद्रों के आसपास टकराव और शह-मात का खेल कोई नई बात नहीं है। जहां सत्ता, वहां ऐसी बातें नहीं होंगी तो फिर कहां होगी। पिछले कई दिनों से एक मंत्री दिल्ली के असली पावर सेंटर में अपनी पोजिशन सुधारने की कोशिश में लगे हैं। मंत्री ने इसके लिए कई तरीके अपनाए। पावर सेंटर तक कुछ दमदार अफसरों की भी शिकायत की गई। अब दमदार अफसरों के भी सेंटर तक शुभचिंतक बैठे हैं तो बात घूम-फिरकर उन तक पहुंच गई। अब अफसरों ने भी गुपचुप काउंटर शुरू किया, लेकिन टकराव की चिंगारियां छिपती नहीं है। ऐसी बातें सात समंदर पार से भी पहुंच जाती है। सत्ता के गलियारों में दिलचस्पी रखने वालों तक घटनाक्रम पहुंच चुका है या यूं कहें कि पहुंचाया जा चुका है। अब इस टकराव बनाम रेपो सुधार अभियान के रिजल्ट का इंतजार है। नेता-पुत्र को सेवा किए बिना मेवा की चाहत, सत्ता की धमक का शौक
सत्ता में कुछ पाने के लिए खुद को खपाना पड़ता है। अब यह बात कई नेता-पुत्र नहीं जानते। उन्हें बिना सेवा किए ही सियासी मेवा यानी रुतबा, रसूख चाहिए। सत्ताधारी पार्टी के एक नेता-पुत्र को भी पिताजी जैसा बनने की सनक सवार हो गई। उनकी तरह ही काफिला लेकर चलते हैं। यह अलग बात है कि नेता-पुत्र को कोई फील्ड में जानता नहीं है। लोग केवल काफिला ही देखते हैं। इसे देख नेताओं के बारे में एक जानकार की कही बात कई बार प्रासंगिक हो जाती है। जिस भी नेता ने अपने बेटे-बेटियों को अपने सियासी प्रभाव की परछाई से दूर रखा। वे लंबे चले और राजनीति में बेवजह बदनाम नहीं हुए। राजनीति में बेटों को वक्त से पहले और सेवा किए बिना मेवा देने वाले नेताओं ने भारी परेशानियां झेली हैं, जिनकी लंबी फेहरिस्त है। बड़े अफसर ने क्यों बदला बैठने का ठिकाना?
एक प्रसिद्ध कहावत है की मन के लड्डू कभी फीके नहीं खाने चाहिए। प्रदेश के सबसे बड़े दफ्तर में तैनात एक बड़े अफसर के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। बड़े अफसर को पता नहीं किसने समीकरण समझाए कि जल्द उन्हें बड़ा पद मिल सकता है। अफसर भी मन ही मन मान बैठे कि जल्द ही वे टॉप पोजिशन हासिल कर सकते हैं। इसका एहसास भी उन्होंने करवा दिया। इस चक्कर में बैठने का ठिकाना भी बढ़ा लिया। मूल की जगह दूसरी जगह प्रेजेंस ज्यादा रहने लग गई। मूल दफ्तर छोड़ नई जगह बैठने की फ्रिक्वेंसी बढ़ने लगी तो चर्चा होने लगी। सत्ता के गलियारों में अब अफसर की खुशफहमी पर खूब चर्चाएं हो रही हैं। सियासी गलियारों के जानकारों का दावा है कि बड़े अफसर का सपना हकीकत बनने की संभावना न के बराबर है, लेकिन वे खुद माने तब न। सुनी-सुनाई में पिछले सप्ताह भी थे कई किस्से, पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें टॉप बैठक में क्यों नाराज हुए चर्चित मंत्री?:धार्मिक कार्यक्रम में सत्ताधारी विधायक का अपमान, प्रमोशन लिस्ट के बाद बड़े अफसरों का दर्द


