पहले अवैध खनन से अलवर के 31 पहाड़ हुए थे खत्म, अब ऊंचाई के पैमाने से अस्तित्व पर संकट

भास्कर न्यूज| अलवर अरावली पर्वतमाला को सुरक्षित करने की कवायद के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। एक तरफ सरकारी रिपोर्ट ने यह खुलासा किया है कि कैसे भूतकाल में हुए अंधाधुंध खनन ने अलवर की भौगोलिक सूरत बिगाड़ दी, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए पहाड़ के नए मानकों ने चिंता पैदा की है। सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट ने अलवर में पूर्व में हुए खनन की भयावह तस्वीर पेश की है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के ‘ग्राउंड ट्रूथिंग’ अध्ययन में सामने आया है कि 1967-68 के नक्शों में जिले में 128 पहाड़ियां दर्ज थीं, लेकिन 2010 आते- आते अब मौके से 31 पहाड़ियां (करीब 24%) पूरी तरह गायब हो गई। यह विनाश रातों-रात नहीं, बल्कि दशकों तक चले खनन का नतीजा था। रिपोर्ट बताती है कि अलवर की किशनगढ़ और तिजारा तहसीलों में अरावली का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। अरावली के इस पुराने घाव पर सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की कमेटी की सिफारिश मानते हुए तय किया है कि अब केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाओं को ही अरावली हिल (पहाड़ी) माना जाएगा। कोर्ट ने नए खनन लीज पर रोक लगाते हुए सस्टेनेबल माइनिंग प्लान बनाने का आदेश भी दिया है। आलोचकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह नई परिभाषा अरावली के लिए घातक साबित हो सकती है। जानकारों के अनुसार, अरावली का एक बड़ा हिस्सा छोटी पहाड़ियों और टीलों के रूप में है। 100 मीटर का नियम लागू होने से अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा वन संरक्षण कानूनों के दायरे से बाहर हो जाएगा। आशंका है कि यह परिभाषा परोक्ष रूप से खनन लॉबी को फायदा पहुंचाएगी। इस फैसले के विरोध में और अरावली को बचाने के लिए 11 दिसंबर 2025 (अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस) को अरावली विरासत जन अभियान शुरू किया गया है। पर्यावरणविदों और आम नागरिकों ने सोशल मीडिया पर #SaveAravalli मुहिम छेड़ी है। लोग ईमेल याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट और सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि पहाड़ की इस नई परिभाषा को रद्द किया जाए। ^सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले से बेहद निराश है। यह फैसला दुनिया की सबसे पुरानी, करीब 2 अरब साल पुरानी पर्वतमाला को गंभीर खतरे में डाल रहा है। लोगोें से ईमेल याचिका पर हस्ताक्षर की अपील की जा रही है। देश के सांसदों से मिल रहे है। कानूनी सलाह भी ले रहे हैं। – नीलम अहलूवालिया, फाउंडर मेंबर, पीपल फॉर अरावली ग्रुप

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