नेता प्रतिपक्ष बोले- मोदी मां के नाम पेड़ लगवा रहे:उनके मंत्री अरावली का चीरहरण कराने की तैयारी में, जनता माफ नहीं करेगी

राजस्थान के नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक पेड़ मां के नाम अभियान चला रहे हैं और दूसरी तरफ उनके वन मंत्री अरावली के हजारों साल पुराने अनगिनत पेड़ों को कटवाने की तैयारी में हैं। अरावली क्षेत्र से आने वाले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव अरावली का चीरहण होते हुए कैसे देख सकते हैं। हम यह नहीं होने देंगे। सेव अरावली अभियान से आमजन को जोड़ेंगे। कांग्रेस इस मुद्दे पर पूरी लड़ाई लड़ेगी। इस मसले पर कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश आने के पहले दिन आवाज उठाई थी। अभी उदयुपर में आंदोलन शुरू हो गया। दो दिन पहले पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पर अभियान शुरू किया। आगे गांव-गांव ढाणी-ढाणी जाकर अभियान चला आमजन को आगे लाएंगे। जूली ने यह बात रविवार को खुद के अलवर कार्यालय पर मीडिया से कही। दिल्ली में तंदूर बंद, इधर अरावली को खान बना रहे जूली ने कहा कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण निर्माण कार्य, डीजल के कार्य, बाहर की गाड़ी और तंदूर पर भी रोक है। इधर पहाड़ काटने की छूट की तैयारी है। वो भी अरावली के पहाड़ को। जो चार राज्यों में फैले हैं। अरावली का 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में आता है। सरकार की गाइडलाइन का कोर्ट से मंजूरी लेकर अरावली के 100 मीटर से कम ऊंचाई के पहाड़ों को अरावली से बाहर किया गया तो 80 प्रतिशत अरावली के पहाड़ों को खान के लिए आवंटित कर देंगे। जिससे 11 हजार पहाड़ खनन के दायरे में आ जाएंगे। सरकार ये माइन्स बीजेपी अपने उद्योगपति मित्र व वर्करों को देना चाहती है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का गांव अरावली के नीचे जूली ने कहा कि हमारे यहां के सांसद व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का हरियाणा में बिलासपुर के पास गांव है। वहां भी अरावली के पहाड़ हैं। पुष्कर अजमेर भी पहाड़ियों से घिरा है। जहां से उन्होंने पढ़ाई की। अलवर उनका संसदीय क्षेत्र है। जो पूरा अरावली की गोद में बसा हैं। यहां पांडूपाले, भर्तृहिरण, करणी माता मंदिर अरावली के पहाड़ों में हैं। इसी तरह हजारों मंदिर अरावली के पहाड़ों में हैं। कांग्रेस के निर्णय का हवाला देकर गुमराह कर रहे जूली ने कहा कि 2010 में कांग्रेस के निर्णय को आधार बता पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर करने की बात कही जा रही है। जबकि सच्चाई ये है कि पूर्व में 2010 में 1008 वैध खाने थी। जिनमें 747 नई थी। 261 नवीनीकरण होकर आई। जिनमें कई लाख लोगों को रोजगार मिल रहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अरावली रेंज में पूरी तरह खनन पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। तब कांग्रेस की सरकार की थी। हमारी सरकार ने खनन को नियंत्रित करने के लिए कोर्ट में कहा था कि जो लीज पहले से चल रही है उसमें छूट दी जाए। नई लीज अरावली में नहीं देंगे। लेकिन कोर्ट नहीं माना था। वापस बीजेपी सरकार आई तो कोर्ट की भावना के विपरीत काम किया। बाद में 53 खान का नवीनकरण किया और 51 नई लीज दी। लेकिन कोर्ट ने वापस फटकार लगाई। नई अनुमति वाली खानों पर रोक लगा दी। 2008 में एमओईएफ की रिपोर्ट में पाया गया कि राजस्थान में बिना ईसी के खनन चल रही हैं और अरावली की परिभाषा में फेरबदल किया जा रहा है। 2008 में हम सत्ता में आने के बाद अवैध खनन के खिलाफ 1400 एफआईआर दर्ज की। सैटेलाइट इमेज से अवैध खनन को रोकने के प्रयास किया। उस समय एसपी व कलेक्टर की जिम्मेदारी तय की। अब 100 मीटर ऊंचाई का दायरा तय करना गलत जूली ने कहा कि 16 फरवरी 2010 को सरकार ने रोजगार बचाने के लिए 100 मीटर की परिभाषा का तर्क दिया था। ताकि रोजगार खत्म नहीं हो। लेकिन कोर्ट ने तीन दिन बाद 19 फरवरी को ही खारिज कर दिया था। अब ये उसी बात का सहारा लेकर 2024 में आ गए। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की एडवाइजरी की पालना कांग्रेस समय में हुई। 1 मार्च 2024 को दिल्ली में राजस्थान के अफसरों ने माना जूली ने कहा कि 1 मार्च 2024 को दिल्ली में बैठक हुई। राजस्थान के वन व खनन विभाग के अधिकारियों ने समर्थन किया कि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ी को अरावली नहीं माना जाए। जबकि सुप्रीम कोर्ट में 2010 में इस परिभाषा को गलत मान लिया था तो अब 2025 में उसे कैसे सही माना जा रहा है। दूसरा सीईसी कमजोर होने से बीजेपी उसका फायदा उठाने में लगी है। पहले सुप्रीम कोर्ट सीईसी बनाता था। लेकिन अब सीईसी की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। जो वन मंत्रालय के अधीन काम करती है। इस कारण सीईसी पूरी तरह पैरवी नहीं कर पा रही है। जूली ने कहा कि हमारी कांग्रेस सरकार जन भावना को सर्वोपरि रखती थी। जिसका उदाहरण है भरतपुर। जहांसाधु संतो ने विरोध किया तो हमने 46 लीज बंद की। उस जगह को वन क्षेत्र घोषित किया। ये कांग्रेस की जन भावना को दर्शाता है। इधर बीजेपी अलवर के सांसद अरावली का चीरहरण होते हुए कैसे देख सकते हैं। अरावली के पहाड़ रेगिस्तान व लू को रोकते हैं। पानी काे रिचार्ज होता है। अरावली नहीं होती तो रेगिस्तान दिल्ली तक चला जाता। 363 पेड़ों के लिए सिर कटवा लिए थे जूली ने कहा कि अब अरावली के हजारों साल पुराने पेड़ खत्म करने पर आ गए, जिसके लिए पूर्वजों ने सिर दे दिए, अब माफिया को पहाड़ देना चाह रहे। ये मुद्दा आने वाली पीढ़ी के अस्तित्व का है। यही सोच हमारे पूर्वजों की रही होती तो ये पहाड़ नदिया, कुएं, बावड़ी देखने को नहीं मिलती। आखिर में जूली ने कहा ….. खेजड़ली में सिर दिए थे, अरावली के लिए आवाज दो पहाड़ बेचने वालों को अब करारा जवाब दो….

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