प्लास्ट पैक 2025; एग्रीकल्चर में प्लास्टिक क्रांति:ग्लोबल वार्मिंग के बीच फसलों की नई संभावनाएं; ऑर्टिफिशियल तालाबों ने बढ़ाई वाटर स्टोरेज की क्षमता

प्लास्ट पैक 2025 ने केवल औद्योगिक जगत में ही नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र में भी प्लास्टिक के नवाचारों से अवगत कराया है। पॉली प्रोपोलीन से बने पौंड लाइनर, प्लास्टिक से बने पॉली हाउस, ग्रीन हाउस और फैब्रिक हाउस ने एग्रीकल्चर में कई बदलाव लाए हैं। ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम के बीच इन नवाचारों ने किसानों को तापमान नियंत्रित करने और फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद की है। ऐसे ही तालाबों में भरपूर पानी स्टोरेज के लिए पीथमपुर की दो कंपनियां पौंड लाइनर और लंबी केनाल का निर्माण करती है। इनकी सप्लाई दूसरे राज्यों में भी हैं। कंपनी के जीतेश अग्रवाल ने बताया- कंपनी पौंड लाइनर (तालाबों की सतह और आसपास लगने वाली मजबूत प्लास्टिक की शीट) बनाती है। इसके लिए किसानों को खेती की जमीन का 2% हिस्सा छोड़ने की जरूरत है। इस स्थान पर छोटा तालाब बनाया जाता है। जीतेश ने कहा- तालाब में तीन फसलों की सिंचाई के लिए पानी एकत्रित किया जा सकता है। इसके लिए पौंड लाइनर को पूरे तालाब और आसपास की दीवारों को लगाकर इसे फीट किया जाता है। इसमें एकत्रित पानी से सालभर भरपूर सिंचाई की जा सकती है। इस पौंड लाइनर के कारण पानी मिट्‌टी में नहीं जाता और हमेशा भरा रहता है। अब आरसीसी नहीं पॉली प्रोपोलीन की केनाल
खास बात यह कि तालाब से दूर तक पानी सप्लाई करने के लिए कंपनी पॉली प्रोपोलीन की केनाल बनाती है। हर केनाल 3 किमी लंबी होती है और इसे कई किमी तक बढ़ाया जा सकता है। इसका फायदा यह है कि सिर्फ केनाल के लिए खुदाई की जरूरत होती है। इसके बाद सीमेंट, क्रांक्रीट (आरसीसी) से बनाने की जरूरत नहीं है। तालाब से पानी फ्लेक्सिबल केनाल से फसलों तक पहुंचाया जाता है। केनाल एक मीटर चौड़ी तक बनाई जा सकती है। भारत सरकार की जितनी भी योजनाएं हैं इसमें इसे उपयोग किया जा सकता है। इसका उपयोग करने से अभी फसलों की जो भी लागत आती है वह 20% कम हो जाती है। यह 0% लीकेज हैं। इसमें एक एडॉप्टर होता है जिससे पानी कहीं भी निकाल सकते हैं। कंपनी 1 वर्ग किमी के तालाब में पौंड लाइनर और केनाल का सफल प्रयोग भी कर चुकी है। पौंड लाइनर की 10 सालों की गारंटी होती है। पीथमपुर की ही एक अन्य कंपनी भी एचडीपी भी पौंड लाइनर का निर्माण करती है। कंपनी के अनिल चौधरी ने बताया कि इसका उपयोग वाटर कंजर्वेशन के साथ फिशरीज के लिए होता है। ऐसे स्थान जहां पानी की कमी है, वहां फल-सब्जी या गेहूं की फसल उगानी है तो वहां एक या दो एकड़ तालाब में पौंड लाइनर का उपयोग कर भरपूर पानी स्टोरेज किया जा सकता है। बकौल चौधरी मप्र में किसानों के लिए बलराम योजना में इस पर 70% तक सब्सिडी मिलती है। किसान नहर के पानी को इसमें स्टोरेज कर लेते हैं। फिर जब भी जरूरत होती है उसका उपयोग करते हैं। यह एक तरह से आर्टिफिशियल पौंड है। कंपनी ने पिछले साल एक खेत में 32 हजार वर्ग किमी के तालाब में पौंड लाइनर लगाया। इस तालाब के स्टोरेज की क्षमता 3 करोड़ लीटर पानी की है। यहां लगे स्टॉलों में बताया गया कि पॉली हाउस और ग्रीन हाउस तकनीक ने मशरूम और केसर जैसी फसलें उगाने को संभव बना दिया है। खासकर मध्य भारत के गर्म इलाकों में जहां सामान्यतः ठंडे क्षेत्रों में ये फसलें उगाई जाती थीं। ये नई तकनीक सूरज की हानिकारक किरणों और अत्यधिक गर्मी से फसलों को बचाती हैं। साथ ही खेती के लिए आवश्यक नमी बनाए रखने में मदद करती हैं। इससे न केवल फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, बल्कि किसानों को उनके उत्पादन से अधिक मुनाफा कमाने का अवसर भी मिला है। कृषि मशीनरी में प्लास्टिक के उपयोग से बढ़ी उत्पादकता प्लास्टिक से बनी अत्याधुनिक मशीनरी ने खेती के पारंपरिक तरीकों को बदल दिया है। सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले ड्रिप सिस्टम और स्प्रिंकलर जैसे उपकरणों ने पानी की बचत सुनिश्चित की है। इसके अलावा प्लास्टिक के मल्चिंग शीट्स ने मिट्टी की नमी बनाए रखने और खरपतवार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई है। इंडियन प्लास्ट पैक फोरम के अध्यक्ष सचिन बंसल ने बताया कि ‘प्लास्ट पैक 2025’ को जबरदस्त रिस्पांस मिला है। इसमें 400 से ज्यादा नेशनल और इंटरनेशनल कंपनियां प्लास्टिक, पैकेजिंग, और पेट्रो केमिकल्स से जुड़े प्रोडक्ट्स और तकनीकों को डेमो दे रही है। तीन दिनों में 42 हजार से ज्यादा विजिटर्स आ चुके हैं। एक्सपो में अब तक 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की मशीनें सेल हो चुकी है। रविवार को एक्सपो का आखिरी दिन है।

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