गुजरात-तेलंगाना में अंगदान में सरकारी अस्पताल को दी जाती है प्राथमिकता अंगदान के लिए मप्र सरकार द्वारा जारी नई पॉलिसी सवालों के घेरे में है। दरअसल, स्टेट ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) के नए नियमों में प्रतीक्षा सूची के बजाय मरीज की स्थिति को प्राथमिकता देने की बात है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका ज्यादा लाभ निजी अस्पतालों को होगा। दरअसल, सरकारी सेटअप में भोपाल में एम्स में ही ट्रांसप्लांट की सुविधा है, लेकिन तकनीकी वजहों से उसे प्राथमिकता नहीं दी जाती। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया में ही ब्रेन डेड मरीजों के ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू नहीं हो पाई है, जबकि अंगदान को लेकर जीएमसी के डीन को ही फैसला लेना है। हालांकि डीन डॉ. कविता सिंह का कहना है कि जल्द हमीदिया में सुविधा शुरू करेंगे।
अन्य राज्यों में एंबुलेंस से एक्सीडेंट के केस सीधे सरकारी अस्पताल में जाते हैं। यहां ब्रेन डेड होने के बाद पहला ऑर्गन संबंधित संस्थान जबकि दूसरे ऑर्गन के लिए सरकारी अस्पताल को तवज्जो दी जाती है। इसलिए गुजरात-तेलंगाना में सबसे ज्यादा ऑर्गन ट्रांसप्लांट सरकारी सिविल अस्पतालों में होता है। मप्र में यह आंकड़ा एक प्रतिशत भी नहीं है। समझिए… निजी अस्पतालों को क्यों ज्यादा फायदा 1. निजी अस्पताल के डॉक्टर्स मरीज की अधिक इमरजेंसी की रिपोर्ट बनाकर मेडिकल कॉलेज के डीन को भेज सकते हैं, जिसे चुनौती देना मुश्किल होगा।
2. निजी अस्पतालों में ब्रेन डेड मरीजों का ऑर्गन डोनेशन लंबे समय से हो रहा है। इनके पास प्रतीक्षा सूची भी लंबी है। (विशेषज्ञों के अनुसार) एम्स में सुविधा, प्राथमिकता नहीं
एम्स में ऑर्गन डोनेशन और ट्रांसप्लांट की सुविधा एक साल पहले ही शुरू हुई है, इसलिए यहां भर्ती मरीजों का नाम वरीयता सूची में निजी अस्पतालों के बाद आएगा। दूसरी वजह… एम्स केंद्रीय संस्थान है, जबकि अंगदान में राज्य के अस्पतालों को प्राथमिकता दी जाती है। यहां किडनी ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग 25 है। निजी अस्पतालों में 100 से अधिक है। विशेषज्ञों ने कहा- ये प्रक्रिया हो
{सभी सरकारी अस्पतालों में ब्रेन डेड मरीजों के ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सुविधा होनी चाहिए।
{एंबुलेंस से एक्सीडेंट केस पहले सरकारी अस्पतालों में जाने चाहिए, जहां से ब्रेन डेड की सूचना सोटो की वेबसाइट में अपडेट होना चाहिए।
{अन्य राज्यों में दूसरा अंग किसी सरकारी अस्पताल को दिया जाता है। मप्र में भी यही होना चाहिए। भोपाल में 26 बार बना ग्रीन कॉरिडोर, 62 को मिली नई जिंदगी… भोपाल में 26 बार ऑर्गन डोनेशन के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया जा चुका है। इससे करीब 62 लोगों को नई जिंदगी मिली है, सबसे ज्यादा किडनी का ही डोनेशन हुआ है। जानिए… कितने समय सुरक्षित रहता है अंग
{हार्ट: 4 से 6 घंटे {लिवर: 6 से 12 घंटे {किडनी: 30 घंटे {इंटेस्टाइन या आंत: 5 घंटे {पैंक्रियाज: 6 घंटे {ऑर्गन डोनेशन इंडिया के मुताबिक भारत में हर साल 5 लाख लोगों को ऑर्गन ट्रांसप्लांट की जरूरत है, जबकि सिर्फ 52,000 ऑर्गन उपलब्ध हैं। अंगदान की नीति में बदलाव की जरूरत
दुर्घटना में एंबुलेंस से मरीज को सरकारी अस्पताल में पहुंचाया जाता है। सबसे ज्यादा ब्रेन डेड मरीजों की संभावना यहीं होती है। इसलिए अंगदान में सरकारी अस्पतालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। नई पॉलिसी से प्राइवेट अस्पतालों को ज्यादा फायदा होगा। वे इमरजेंसी ज्यादा दिखा सकते हैं। इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। अंगदान की नीति में बदलाव की जरूरत है।
-जीतू बागनानी, स्टेट ऑर्गन डोनेशन सोसायटी के सदस्य कमी है तो दूर करेंगे
हाल में स्पष्ट पॉलिसी हमने जारी की है। इसके बावजूद कोई कमी है तो दूर करेंगे। -राजेंद्र शुक्ला, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री


