प्राचीन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अवशेष बैतूल पहुंच गए हैं। श्रीश्री रविशंकर के शिष्य शिव तेज इन्हें बेंगलुरु से लेकर आए हैं। सोमवार 22 दिसंबर को दोपहर 3:30 बजे से रामकृष्ण बगिया में श्रद्धालु इन अवशेषों के दर्शन कर सकेंगे। इस दौरान रुद्राभिषेक, भजन और सत्संग का आयोजन भी किया जाएगा। शिव तेज ने बताया कि मान्यता के अनुसार यह वही दिव्य ज्योतिर्लिंग है, जिसकी स्थापना सतयुग में भगवान चंद्र ने की थी। इसे प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मान्यता है कि यह शिवलिंग भूमि को स्पर्श नहीं करता था और हवा में तैरता था। 1026 में खंडित हुआ शिवलिंग, 1000 साल तक गुप्त रखा
उन्होंने बताया कि वर्ष 1026 में महमूद गजनवी के आक्रमण के दौरान यह शिवलिंग खंडित हो गया था। इसके बाद एक अग्निहोत्री ब्राह्मण परिवार इसके अवशेषों को लेकर दक्षिण भारत चला गया और पीढ़ियों तक इन्हें गुप्त रूप से सुरक्षित रखा। शिव तेज ने बताया कि वर्ष 1924 में कांचीपीठ के आठवें शंकराचार्य चंद्रशेखर सरस्वती ने निर्देश दिए थे कि इन अवशेषों को सौ वर्षों तक गुप्त रखा जाए। सौ वर्ष पूर्ण होने के बाद शास्त्री परिवार ने कुंभ से पहले ये अवशेष श्रीश्री रविशंकर जी को सौंपे। देशभर में यात्रा के माध्यम से कराए जा रहे दर्शन
गुरुदेव श्रीश्री रविशंकर के आशीर्वाद से अब यह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग यात्रा के माध्यम से देशभर में श्रद्धालुओं को दर्शन दे रहा है। शिव तेज ने कहा कि आमतौर पर लोग ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जाते हैं, लेकिन इस बार स्वयं शिवलिंग बैतूल आया है। भास्कर रिपोर्टर ने देर रात इस शिवलिंग के अवशेषों को देखा। इसमें विशेष चुंबकीय गुण नजर आए। जब पत्थरों को पास लाया गया तो वे एक-दूसरे को आकर्षित करते दिखाई दिए। लोहे की कील पास लाने पर भी वह चुंबक की तरह प्रतिक्रिया करती नजर आई। GSI रिपोर्ट में चुंबकीय क्षेत्र की पुष्टि
इस ज्योतिर्लिंग के पत्थरों की जांच दो संस्थानों द्वारा की गई है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की 23 अक्टूबर 2007 की रिपोर्ट के अनुसार शिवलिंग के दो नमूनों में प्रबल चुंबकीय क्षेत्र पाया गया। पहले नमूने के केंद्र में लगभग 140 गॉस और दूसरे नमूने में 120 गॉस चुंबकीय क्षेत्र दर्ज किया गया। बेरियम समेत कई तत्व पाए गए
तत्वीय विश्लेषण में इसमें बेरियम (78 प्रतिशत), सिलिकॉन, मैग्नीशियम, सल्फर और आयरन पाए गए। एक्स-रे विवर्तन परीक्षण में इसकी क्रिस्टल संरचना किसी भी ज्ञात खनिज से मेल नहीं खाई, जिससे यह पदार्थ अद्वितीय संरचना वाला सिद्ध हुआ। मद्रास जेम इंस्टीट्यूट ने भी मानी चुंबकीय विशेषता
मद्रास रत्न संस्थान, चेन्नई की 27 दिसंबर 2013 की रत्न विज्ञान रिपोर्ट में इस पत्थर को “क्ले स्पेसिमेन” बताया गया है। रिपोर्ट में मजबूत चुंबकीय क्षेत्र पाया गया दर्ज किया गया है। इसमें नमूने का रंग हल्का पीला अपारदर्शी बताया गया है और इसकी हार्डनेस 4 दर्ज की गई है। धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक नजरिए से भी दुर्लभ
इन सभी वैज्ञानिक परीक्षणों से यह प्रमाणित होता है कि यह शिवलिंग केवल धार्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी असामान्य चुंबकीय गुणों वाला दुर्लभ पत्थर है। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के सहयोग से यह यात्रा बैतूल पहुंची है। संस्था की जिला समन्वयक डॉ. अलका पांडे ने बताया कि श्रद्धालुओं के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं। सोमवार को रामकृष्ण बगिया में विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और सत्संग का आयोजन होगा, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।


