केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मूल स्वरूप में संभावित बदलाव और इसके नाम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का संबोधन हटाए जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक रंग ले लिया है। इस मुद्दे पर सोमवार को नीमच जिला कांग्रेस कमेटी और कई संगठनों ने केंद्र की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। शहर के फोर जीरो चौराहे पर धरना किया गया। इसके बाद विजय टॉकीज तक एक आक्रोश रैली निकाली गई, जिसमें केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। प्रदर्शन के समापन पर राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन तहसीलदार को सौंपा गया। इस दौरान कांग्रेस जिला अध्यक्ष तरुण बाहेती, पूर्व विधायक संपत स्वरूप जाजू, अनिल चौरसिया, ओम दिवान, मोनू लॉक्स, आशा सांभर, महेंद्र सिसोदिया, श्याम सोनी, बलवंत पाटीदार आदि मौजूद रहे। ज्ञापन में मनरेगा योजना के अस्तित्व और महात्मा गांधी के सम्मान को अक्षुण्ण रखने की मांग की गई। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र की वर्तमान नीतियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस ऐतिहासिक कानून को कमजोर करने की साजिश रच रही हैं। आंदोलन के दौरान केंद्र की नई वित्तीय नीतियों पर भी सवाल उठाए गए। ज्ञापन में बताया गया कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे मनरेगा का आर्थिक बोझ राज्यों पर डाल रही है। इससे उन राज्यों पर भारी वित्तीय दबाव बढ़ेगा जो पहले से ही संकट में हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं और पलायन की समस्या बढ़ सकती है। इसके अतिरिक्त, जिले में श्रमिकों की लंबित मजदूरी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिनिधियों ने बताया कि डिजिटल हाजिरी और जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण गरीब मजदूर महीनों से भुगतान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाते हुए मांग की गई कि केंद्र को मनरेगा के मूल ढांचे और नाम के साथ छेड़छाड़ न करने के निर्देश दिए जाएं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अपनी नीतियों को वापस नहीं लिया और श्रमिकों की रुकी हुई मजदूरी का तत्काल भुगतान नहीं किया, तो यह विरोध आने वाले समय में एक बड़े जन आंदोलन का रूप लेगा।


