सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन (एमडीएम) योजना इन दिनों गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है। जिले के स्कूलों को अंडा मद और कुकिंग कॉस्ट की राशि समय पर नहीं मिल पा रही है। इससे एमडीएम योजना के संचालन में भारी दिक्कतें आ रही हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने रांची जिले के करीब 30 सरकारी स्कूलों का ग्राउंड सर्वे किया। पड़ताल में सामने आया कि अक्टूबर 2025 के बाद से स्कूलों को अंडा मद की राशि नहीं मिली है। जबकि कुकिंग कॉस्ट कई स्कूलों में माइनस बैलेंस में चल रहा है। स्थिति यह है कि स्कूल प्रबंधन को अपनी जेब से पैसे लगाकर एमडीएम चलाना पड़ रहा है। वहीं अंडा की तय राशि और बाजार मूल्य में अंतर ने समस्या को और गहरा कर दिया है। एमडीएम जैसी महत्वाकांक्षी योजना में भुगतान में देरी से सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों पर पड़ रहा है। प्रधानाध्यापकों का कहना है कि यदि जल्द राशि जारी नहीं हुई तो योजना की गुणवत्ता और निरंतरता दोनों प्रभावित होंगी। स्कूल में 200 बच्चे नामांकित हैं। प्रतिदिन 85–90 प्रतिशत छात्र उपस्थित रहते हैं, जिनके लिए एमडीएम बनता है। प्रधानाध्यापक नसीम अहमद बताते हैं कि अक्टूबर के बाद से अंडा मद की राशि नहीं मिली है। कुकिंग कॉस्ट पहले से माइनस में चल रहा है। ऐसे में एमडीएम चलाना मुश्किल हो गया है। यहां 205 छात्र पढ़ते हैं और प्रतिदिन 80-90% बच्चों के लिए भोजन बनता है। प्रधानाध्यापक अरविंद कुमार कहते हैं कि अंडा मद की राशि अक्टूबर के बाद नहीं मिली। कुकिंग कॉस्ट 97 हजार रुपए माइनस में है। 6 रुपए में अंडा मिलना संभव नहीं है, बाजार में 8 रुपए अंडा के लिए देने पड़ रहे हैं। एमडीएम के तहत अंडा मद और कुकिंग कॉस्ट की लंबित राशि सरकार से प्राप्त होते ही संबंधित विद्यालयों को भुगतान कर दिया जाएगा। अंडा मद की राशि पहले से निर्धारित है, इसमें वृद्धि किया जाना नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है। – बादल राज, जिला शिक्षा अधीक्षक एमडीएम के तहत सरकार द्वारा प्रति बच्चे प्रति अंडा 6 रुपए की राशि निर्धारित है। पर भास्कर की पड़ताल में पाया गया कि बाजार में अंडा 7.50 से 8 तक खरीदा जा रहा है। ऐसे में स्कूलों के सामने या तो घाटा उठाने या फिर अंडा के लिए जेब से पैसे लगाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। कई प्रधानाध्यापकों ने माना कि इस अंतर का बोझ सीधे स्कूल प्रबंधन पर पड़ रहा है।


