अरावली बचाओ संघर्ष समिति सहित विभिन्न संगठनों के बैनर तले आज भीलवाड़ा जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के बाद उन्होंने अतिरिक्त जिला कलेक्टर को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया।प्रदर्शन से पहले उन्होंने सूचना केंद्र चौराहे से जिला कलेक्ट्रेट तक विरोध रैली भी निकाली जिसमें उन्होंने अरावली मामले को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज करवाया हैं। आदेशों का दुरुपयोग भूमाफिया ओर खनन माफिया कर रहा समिति के नारायण भदाला ने बताया कि पूर्व में राज्य सरकार की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 100 मीटर के दायरे में आदेश जारी किए गए थे।इसका दुरुपयोग भूमाफिया और खनन माफिया कर रहे हैं। इससे पर्वतमाला का प्राकृतिक संतुलन और जैव विविधता गंभीर खतरे में है। अरावली केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई प्राचीन पर्वतमाला है। यह क्षेत्र जल, जंगल और वनस्पतियों का संरक्षण करता है और प्राकृतिक आपदाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजस्थान असंतुलन की चपेट में आ जाएगा अरावली क्षेत्र में उदयपुर, माउंट आबू, सिरोही, पाली, अजमेर और राजसमंद जैसे अनेक ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थल मौजूद हैं। यहाँ के झरने, वन्यजीव और प्राकृतिक सौंदर्य राज्य की पहचान हैं। अरावली पर्वतमाला भूजल स्तर बनाए रखने, वर्षा जल संचयन और जलवायु संतुलन के लिए जरूरी है। अगर यह कमजोर हुई तो राजस्थान का बड़ा हिस्सा जल संकट, बढ़ती गर्मी और पर्यावरणीय असंतुलन की चपेट में आ सकता है। वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा समिति के विश्व बंधु सिंह राठौड़ ने बताया कि वर्तमान में कई क्षेत्रों में पहाड़ों को तोड़कर निर्माण और औद्योगिक विस्तार किया जा रहा है। जंगल काटे जा रहे हैं और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। इससे आने वाले समय में राज्य को अपूरणीय क्षति हो सकती है। जीवनब संस्थान ने सरकार से मांग की है कि अरावली पर्वतमाला के 100 मीटर के दायरे में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर पुनर्विचार किया जाए, अवैध खनन पर रोक लगे और अरावली क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए। पर्यावरणीय संतुलन और जनहित को ध्यान में रखा जाए स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।अरावली की परिभाषा में कोई भी कमी पर्यावरणीय असंतुलन, भूजल संकट और अवैध खनन को बढ़ावा दे सकती है। सरकार और प्रशासन से अनुरोध किया है कि अरावली पर्वतमाला की परिभाषा में किसी भी प्रकार का बदलाव पर्यावरणीय संतुलन और जनहित को ध्यान में रखते हुए किया जाए, ताकि इस प्राचीन पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।


