निवाड़ी में ओरछा गुदरई गांव में जमीन का सीमांकन पूरा:किसान नाराज, बोले- नई रिपोर्ट में हमारी भूमि को प्रभावित कर रही

निवाड़ी जिले की ओरछा तहसील के मौजा गुदरई में जमीन को लेकर चल रहा विवाद प्रशासनिक हस्तक्षेप के बावजूद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। जिला प्रशासन की गठित टीम ने दो दिनों तक मौके पर रहकर सीमांकन की कार्रवाई की, लेकिन इस नाप-जोख ने विवाद को सुलझाने के बजाय और अधिक उलझा दिया है। एक तरफ जहां जमीन मालिक प्रणव जैन इस कार्रवाई से संतुष्ट दिख रहे हैं, वहीं किसान देवकी कुशवाहा सहित अन्य किसानों ने इस नए सीमांकन को सिरे से खारिज कर दिया है। वीडियो से शुरू हुआ था विवाद यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया था जब मुख्य सड़क की जमीन पर रातों-रात जेसीबी चलाकर कब्जा करने का प्रयास किया गया। एक किसान का न्याय की मांग का वीडियो सामने आया था। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया और ओबीसी महासभा सहित कुशवाहा समाज के लोगों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था। तहसीलदार ने स्वीकारी थी भूमाफिया की दखल विवाद बढ़ता देख ओरछा तहसीलदार सुनील बाल्मीकि ने प्रारंभिक हस्तक्षेप किया था। उन्होंने वर्ष 2009 के सीमांकन रिकॉर्ड के आधार पर किसानों को उनकी भूमि पर पुनः कब्जा दिलाया। उस समय तहसीलदार ने मीडिया से बातचीत में यह स्वीकार किया था कि भूमाफिया ने रातों-रात कब्जा करने की कोशिश की थी। उन्होंने दोनों पक्षों को शांत करने के लिए भविष्य में फिर से सीमांकन कराने का भरोसा दिया था। दोबारा सीमांकन से बढ़ी नाराजगी तहसीलदार के वादे के अनुसार, जिला प्रशासन की टीम ने ओरछा गुदरई पहुंचकर दोबारा जमीन की नाप-जोख शुरू की। दो दिनों तक चली इस मैराथन सीमांकन प्रक्रिया के बाद भी किसान संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने प्रशासन के सामने अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह सीमांकन उनके हितों के खिलाफ है। किसानों का मानना है कि प्रशासन की नई रिपोर्ट उनके हक की जमीन को प्रभावित कर रही है। प्रक्रिया की पारदर्शिता पर किसानों के सवाल किसानों ने इस कार्रवाई के समय और तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। किसानों का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें न तो मौके पर तैयार किया गया पंचनामा दिखाया और न ही उसे पढ़कर सुनाया गया। वे यह समझने में पूरी तरह असमर्थ हैं कि 2009 में तत्कालीन तहसीलदार सतीश वर्मा के समय का सीमांकन सही था या वर्तमान टीम का किया गया कार्य। ‘गलत पॉइंट’ के तर्क पर उलझा मामला किसानों का दावा है कि वे वर्ष 2009 से ही तय सीमा में खेती करते आ रहे हैं और हाल ही में तहसीलदार सुनील बाल्मीकि ने भी उसी सीमा को सही माना था। इसके बावजूद, वर्तमान दल में शामिल तहसीलदार जगदीश रंधावा और भू-अभिलेख अधिकारी लीना जैन का कहना है कि 2009 में सीमांकन ‘गलत पॉइंट’ से शुरू किया गया था। अब प्रशासन का तर्क है कि इस बार ‘सही पॉइंट’ से नाप की गई है, जिसे किसान मानने को तैयार नहीं हैं। कुशवाहा समाज ने दी आंदोलन की चेतावनी इस पूरे विवाद ने अब सामाजिक और राजनीतिक रूप ले लिया है। कुशवाहा समाज के जिलाध्यक्ष गंगाराम कुशवाहा ने प्रशासन को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि पीड़ित किसान को उसकी जमीन वापस नहीं मिली और न्याय नहीं किया गया, तो समाज बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होगा। किसान परिवार का कहना है कि वे प्रशासनिक भ्रम और तकनीकी पेंच के बीच अपने हक की लड़ाई जारी रखेंगे। दूसरे पक्ष ने जताया प्रशासन पर भरोसा मामले के दूसरे पक्ष और जमीन के मालिक प्रणव जैन का रुख किसानों से बिल्कुल अलग है। उन्होंने प्रशासनिक टीम की कार्रवाई का स्वागत करते हुए कहा कि वे जिला कलेक्टर द्वारा गठित सीमांकन दल की नाप से पूरी तरह संतुष्ट हैं। प्रणव जैन के अनुसार, उन्हें जिला प्रशासन और कानून की प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है। फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक भ्रम, तकनीकी जटिलताओं और भरोसे के संकट के बीच बुरी तरह अटका हुआ है।

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