मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव प्रमोद शुक्ला ने मंगलवार को इंदौर में संपत्ति कर वृद्धि के प्रस्ताव को निरस्त करने संबंधी मांग पर सुनवाई की। इस दौरान पूर्व पार्षद दिलीप कौशल अपने अधिवक्ता जयेश गुरनानी के साथ मंत्रालय पहुंचे और संपत्ति कर वृद्धि के प्रस्ताव को रद्द कर इंदौर के 7.35 लाख संपत्ति कर खातों में लगाए गए अतिरिक्त कर को वापस लेने की मांग रखी। गुरनानी के मुताबिक, साल 2020 में मध्य प्रदेश सरकार ने राजपत्र जारी कर प्रत्येक जिले में संपत्ति कर लेने या बढ़ाने के लिए कलेक्टर द्वारा मौजूदा वित्त वर्ष में निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार संपत्ति कर निर्धारण के नियम बनाए थे। लेकिन इंदौर की भाजपा परिषद द्वारा इस नियम को दरकिनार करते हुए पूर्व की संपत्ति कर दरों में सीधे 10% की वृद्धि कर दी गई। इससे नगरीय क्षेत्र की 923 कॉलोनियां सीधे तौर पर प्रभावित हुईं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024-25 और 2025-26 की कलेक्टर गाइडलाइन में 923 कॉलोनियों में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हुई है। वहीं, 146 नई कॉलोनियों का मूल्यांकन पहली बार होने के कारण उन पर संपत्ति कर बढ़ाना भी अनुचित है। इसके अलावा 184 कॉलोनियों की गाइडलाइन में 0% से 10% तक वृद्धि होने के बावजूद सभी पर समान रूप से 10% संपत्ति कर बढ़ा दिया गया। सुनवाई में बताया गया कि इंदौर नगर निगम परिषद द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं करके प्रत्येक करदाता के मौलिक अधिकारों का हनन किया है। किसी भी करदाता को सुनवाई का अवसर नहीं देकर संपत्ति कर राशि की निर्धारण स्लैब की राशि 36,000/- से 25,000/- हजार, 60,000/- से 45,000/- और 60,001/- से अधिक के स्थान पर 45,001/- कम कर दी गई है। जिसके कारण इंदौर के कर दाताओं पर 25% से 50% तक का अतिरिक्त भार पड़ा है दिलीप कौशल ने बताया कि इंदौर के 7.30 लाख कर दाताओं द्वारा प्रति वर्ष करोड़ों रुपए शासन और नगर निगम को कर के रूप में दिए जाते हैं। इसके बाद भी इंदौर शहर की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। सरकार के आदेश (राजपत्र) के विपरीत नगर निगम इंदौर द्वारा की गई कर वृद्धि इंदौर की जनता से खुली लूट है।


