अरावली की नई परिभाषा से जयपुर, सीकर, दौसा, अलवर और झुंझुनूं में पहाड़ पर संकट पैदा हो सकता है। दरअसल, नई परिभाषा में केवल उन्हीं भू-आकृतियों को अरावली पहाड़ी माना जाएगा, जो धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक ऊपर होंगे। जबकि प्रदेश के इन पांच जिलों में अरावली पर्वत शृंखला की अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर के आसपास ही हैं। ऐसे में इन जिलों में पड़ाड़ियों में खनन की छूट मिल जाएगी। चिंता इसलिए भी है कि वर्ष 2021-22 के मुकाबले राज्य में ओपन फॉरेस्ट एरिया 12,208.16 वर्ग किमी से घटकर 2023-24 में 12,087.6 वर्ग किमी रह गया। इसमें 120 वर्ग किमी कमी आई है। यह क्षेत्र अरावली पर्वत शृंखला का ही हिस्सा माना जाता है। इसमें कमी का मतलब इन क्षेत्रों में खनन समेत अन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। बता दें, भारतीय वन सर्वेक्षण के मापदंडों के अनुसार, राजस्थान में अरावली क्षेत्र दक्षिण, मध्य और उत्तरी में बंटा हुआ है। जयपुर, अलवर, सीकर, झुंझुनूं और दौसा उत्तरी अरावली क्षेत्र में है। इन जिलों में अधिकांश पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर के आसपास ही है। भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट – ऐसे बर्बाद हो रही अरावली… एक गांव, 300 क्रशर और 150 जगह खनन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस अरावली को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उसे कितनी बेरहमी से बर्बाद किया जा रहा है, वह जानकर आप हैरान रह जाएंगे। भास्कर टीम मंगलवार को हरियाणा के भिवानी जिले के खानक गांव पहुंची। तोशाम विधानसभा सीट का 4 किमी में फैला छोटा सा गांव। एक तरफ से दक्षिण-पश्चिम अरावली पहाड़ियों से घिरा हुआ। यहां चारों तरफ धूल ही धूल दिखाई देगी, क्योंकि गांव में हर 100 कदम पर 300 क्रशर मशीनें पहाड़ियों को खोद रही हैं। यहां 150 खनन साइट हैं। गांव में 1500 घर हैं, जिनमें हरेक की दीवारों में या तो दरारें हैं, या उनके प्लास्टर उधड़ चुके हैं। सरपंच संजय ग्रोवर ने बताया कि 10 हजार की आबादी में 20 पेट्रोल पंप। किसी गांव में ऐसा देखा है। खनन का पूरा अधिकार एक ही कंपनी एचएसआईडीसी को मिला है। हालांकि पहले अवैध खनन पर भी सवाल उठते रहे हैं। हमारे घर दरक रहे हैं। ब्लास्ट की आवाजों से बच्चों के दिल-दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है। इन्हें बंद कराने के लिए कलेक्टर, एसपी के यहां धरने दे चुके। ब्लास्टिंग को लेकर चार-पांच मुकदमे दायर कर चुके, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। आंखों के सामने पूरा पहाड़ हरियाली से नंगा कर दिया गया। सामाजिक कार्यकर्ता अशोक मलिक बताते हैं कि अरावली के वही पहाड़ यहां संपूर्ण रूप से बचे हैं, जिनमें भगवान का वास माना गया। उत्तर भारत और थार रेगिस्तान के बीच बैरियर है अरावली, ये खत्म हुआ दिल्ली में हमेशा धुंध रहेगी भास्कर एक्सपर्ट – नीलम अहलूवालिया, संस्थापक सदस्य, पीपल फॉर अरावली व विरासत जन अभियान अरावली शृंखला 692 किमी लंबी है, जो गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में फैली है। इसके प्रति हेक्टेयर में 20 लाख लीटर भूजल पुनर्भरण की क्षमता है। अपनी ऊंचाई के कारण ही यह धरोहर प्राकृतिक डस्ट बैरियर है, जो थार मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक रुकावट का काम करती है, जिससे मरुस्थलीय रेतीली हवाएं मैदानी इलाकों तक नहीं पहुंच पातीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यहां खनन और वनों की कटाई बढ़ी तो दिल्ली एनसीआर में पीएम10 और पीएम2.5 जैसे प्रदूषक कण तेजी से बढ़ेंगे। दिल्ली हमेशा स्मॉग में घिरी रहेगी। यही पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम मानसून रोककर बारिश का पानी पहुंचाती है। ये मिटी तो हरियाणा-राजस्थान में अकाल की नौबत आ सकती है। यह पर्वतमाला न हो तो तेंदुआ, सियार, भेड़िया जैसे जीव-जंतु, वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। बनास, लूणी, साहिबी जैसी नदियां सूख जाएंगी।


