चंद्रशेखर मंडल बोलबा का अलिंगुड जतरा टोंगरी प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहां की सफ़ेद चट्टानों से होकर कल कल करती बहती है डोंगाजोर नदी । नदी के किनारे गौरुंदा का पौधा मानव नदी को माला पहनाए जैसा दिखती है जिसे देखने के लिए नव वर्ष में शैलानियों की काफी भीड़ उमड़ती है। बोलबा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आलिंगुड में 14 जनवरी को मकर संक्रांति के मौक़े पर मेले का आयोजन किया जा रहा है। मेले के आयोजन से पहले भगवान ओंकारेश्वर की विधिवत पूजा अर्चना के बाद मेले का आयोजन होता है इस मौक़े पर पैंकी नृत्य एवं झूमर नृत्य का विशेष आयोजन किया जाता है। यह स्थान पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होने की अपार संभावना से भरा है। नदी पर ही एक डैम निर्माण के लिए सर्वेक्षण हुआ है यदि उस डैम के निर्माण हो जाने पर पर्यटक स्थल के रूप में इसका विकास भी होने लगेगा लोगों को रोजगार भी मिलेंगे। इस संबंध में शिक्षक तरुण कुमार सिंह ने बताया कि भगवान राम अपने वनवास काल के समय जब रामरेखा धाम आए थे उसी समय कुछ समय के लिए जतरा टोंगरी पर भी निवास किए थे जिसके कारण यहां की धार्मिक एवं प्राकृतिक मान्यता ज्यादा है। ग्रामीण विश्वा सिंह ने कहा की चट्टानों के नीचे गुफा है । जिसमें अभी भी लगता है कि साधु मुनि तपस्या कर रहे हैं जिसमें गुफा मे कान लगाकर सुनने से कुछ आवाज सुनाई देती है।ग्रामीण टकबर सिंह ने कहा कि जतरा टोंगरी में धार्मिक मान्यता के साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी काफी आकर्षण का केंद्र है इसे प्रशासन द्वारा पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने पर विचार करे। ग्रामीणों के अनुसार यह मेला धार्मिक एवं प्राकृतिक महता बताई गई है। जिसमे धार्मिक महता एवं नामकरण के बारे में कहा जाता है कि त्रेता युग में देवी देवताओं द्वारा जतरा का आयोजन किया गया था. जिसमें भगवान शिव की पूजा अर्चना की गई थी और महाप्रसाद का वितरण किया गया है जिसका कुछ साक्य आज भी चट्टानों पर देखी जा सकती है जिसमें सभी देवताओं को प्रसाद मिला था उसका चिन्ह अभी भी विद्यमान है इसके बाद 2016 से मेले का आरम्भ किया गया. इसके बाद अब तक लगते आ रहा है. मेला लगने से पूर्व से ही इस स्थान का नाम जतरा टोंगरी के नाम से जाना जाता है. साथ ही दो सांपों का चिन्ह है जिसे कहा जाता है कि इस अनुष्ठान में बासुकीनाथ भी उपस्थित हुए थे लेकिन प्राकृतिक आपदा के कारण सांपों का चिह्न मिट गया है पर प्रसाद वितरण का चिह्न अभी भी देखा जा सकता है यह स्थल लगभग 6 से 8 एकड़ पर फैला चट्टान की अनेक गुफा है। ग्रामीण बिरनाथ सिंह ने कहा कि जतरा टोंगरी मे देवी देवताओं के निवास स्थान के रूप में जाना जाता है यहां पर आने को देवी देवताओं के आने जाने एवं निवास की बातें हमारे पुरखों द्वारा बताए जाते हैं।


