बेटे की तलाश में आए थे…कंकाल मिला:बागेश्वर धाम से पहुंचे पिता की आखिरी उम्मीद टूटी; मथुरा हादसे के 7 पीड़ित परिवारों की कहानी

यमुना एक्सप्रेस-वे हादसे में अपनों की तलाश में बीते 8 दिनों से भटक रहे परिवारों की आखिरी उम्मीद भी मंगलवार को खत्म हो गई। डीएनए सैंपल की रिपोर्ट आते ही लापता लोगों की मौत की पुष्टि हो गई। रिपोर्ट मिलते ही परिजनों का हौसला भी जवाब दे गया। पथराई आंखों में जो उम्मीद बची थी, वह जले हुए कंकाल देखकर पूरी तरह टूट गई। बुधवार को प्रशासन ने 7 परिवारों को उनके अपनों के शव सौंप दिए। दरअसल, 16 दिसंबर की सुबह यमुना एक्सप्रेस-वे के माइल स्टोन-127 पर घने कोहरे के कारण 18 वाहन आपस में टकरा गए थे। टक्कर इतनी भीषण थी कि 9 बसों और कारों में आग लग गई। हादसे में 19 लोग जिंदा जल गए, जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। हादसे में मारे गए लोगों के शव इस कदर जल चुके थे कि उनकी पहचान कर पाना मुश्किल हो गया। शुरुआत में सिर्फ 4 शवों की ही शिनाख्त हो सकी थी। इसके बाद बाकी 15 शवों की पहचान के लिए प्रशासन ने उन परिजनों के डीएनए सैंपल लिए, जो अपनों की तलाश में पहुंचे थे। इन सैंपल्स को जांच के लिए आगरा स्थित लैब भेजा गया था। वहां से प्रशासन को अब तक 10 लोगों की डीएनए रिपोर्ट मिल चुकी है, जिनमें से 7 शव परिजनों को सौंपे गए। शव मिलते ही परिवार वाले बिलख पड़े। वे अपनों की सलामती की उम्मीद लेकर यहां पहुंचे थे, लेकिन सामने जले हुए शवों के कंकाल थे। अपनों को इस हालत में देखकर परिजनों की आंखें छलक पड़ीं। भारी मन और टूटे हौसले के साथ वे शवों को अपने साथ ले गए। दैनिक भास्कर ने उन 7 परिवार से बात की। पढ़िए रिपोर्ट… DNA रिपोर्ट के आधार पर सौंप दिए गए 7 शव मंगलवार को प्रशासन ने कानपुर के रहने वाले सलीम, आजमगढ़ के रहने वाले सुनील कुमार, इटावा के रहने वाले सलीम, जालौन के रहने वाले राघवेंद्र, कानपुर के रहने वाले अनुज श्रीवास्तव, संभल के रहने वाले पंकज और हमीरपुर के रहने वाले शैलेंद्र के परिवार वालों को उनके शव सौंप दिए। जबकि अयोध्या के रहने वाले प्रदीप और बांदा के रहने वाले ऋषभ विश्वकर्मा के परिजन पहुंच नहीं सके हैं। उनके आने के बाद शव सौंपा जाएगा। हादसे से 5 मिनट पहले पिता से ड्राइवर बेटा बोला- दिल्ली पहुंचकर कॉल करता हूं हादसे में संभल के रहने वाले पंकज की भी मौत हो गई। पंकज, बस के ड्राइवर थे। वह गोरखपुर से लक्ष्मी हॉलीडेज ट्रैवल्स की बस लेकर दिल्ली जा रहे थे। हादसे के बाद उनका पता नहीं चल सका था। पंकज की तलाश में पहुंचे उनके पिता जगदीश पाल कई दिनों तक भटकते रहे। भारी मन से उन्होंने बेटे की पहचान के लिए ब्लड सैंपल दिया। सोमवार को डीएनए मैच हाे गया। रिपोर्ट आने के बाद जगदीश पाल फफक पड़े। बोले-वह बेटे की तलाश में आए थे, यहां उसका जला हुआ कंकाल मिला है। जगदीश पाल ने बताया कि 16 दिसंबर को जिस समय हादसा हुआ, उसके ठीक 5 मिनट पहले बात हुई थी। रात करीब 3 बजे आगरा से निकलने के बाद उनके मोबाइल पर पिता जगदीश का कॉल आया। इसके बाद उनकी लगभग 20 मिनट बात हुई। पंकज ने पिता से कहा था कि वह दो घंटे में दिल्ली पहुंच कर कॉल करेगा। बागेश्वर धाम में थे पिता, हादसे की जानकारी पर पहुंचे पंकज के पिता जगदीश, पूजा-पाठ में रमे रहते हैं। वह साधु के भेष में रहते हैं। बेटे का पोस्टमॉर्टम कराने पहुंचे जगदीश ने बताया- जिस दिन हादसा हुआ, उस वक्त बागेश्वर धाम में था। जगदीश पाल ने बताया सुबह पूजा-पाठ करने के बाद जब फोन नहीं आया तो उन्होंने अपने छोटे बेटे पंकज को सुबह 8 बजे कॉल किया। 9 बजे पता चला कि एक्सप्रेसवे पर हादसा हो गया है। जानकारी मिलने के बाद बेटा और अन्य लोग यहां आए। तब शाम 5 बजे पता चला कि पंकज की बस भी उसमें थी। पिता ने आरोप लगाया कि इस मामले में ट्रेवल्स कंपनी के मालिक ने उनकी मदद नहीं की। वह सोमवार को मिलने दिल्ली भी गए थे लेकिन वह नहीं मिले। अनुज के परिजनों को नहीं हो रहा विश्वास कानपुर में साईं इवेंट कंपनी के मालिक अनुज भी शताब्दी ट्रेवल्स की बस में यात्रा कर रहे थे। अपने एक कर्मचारी सोनू वर्मा के साथ यात्रा कर रहे अनुज भी हादसे का शिकार हुए थे। अनुज की तलाश में उनका भाई शुभम श्रीवास्तव एक हफ्ते से मथुरा से आगरा के अस्पतालों के चक्कर लगा रहे थे। शुभम ने शिनाख्त के लिए अपना DNA सैंपल भी दिया था। सोमवार को जब उनके पास प्रशासन ने फोन कर बताया कि एक शव का DNA आप से मैच हुआ है। यह शव अनुज का है। यह सुनकर पूरा परिवार सदमे में आ गया। शिनाख्त नहीं होने तक जो उम्मीद बची थी, वह भी खत्म हो चुकी थी। हमीरपुर के शैलेंद्र का शव ले गए परिजन गांव बरुआ गुहान हमीरपुर के 50 वर्षीय शैलेंद्र भी मरने वालों में शामिल थे। शैलेंद्र, कौशांबी में फलों का काम करते थे। वह गांव से दिल्ली जाने के लिए बस में सवार हुए। मंगलवार को पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे परिजन रो-रोकर बेहाल थे। जिस बस पर ड्राइवर थे, उसी में हुई मौत हादसे का शिकार कानपुर के रहने वाले सलीम भी हुए। सलीम कानपुर की शताब्दी ट्रैवल्स की बस चलाते थे। 4 साल से ड्राइवरी कर रहे सलीम 15 दिसंबर की रात को कानपुर से दिल्ली के लिए शताब्दी ट्रैवल्स की स्लीपर क्लास बस लेकर चले। वह जैसे ही थाना बलदेव क्षेत्र के माइल स्टोन 127 पर पहुंचे, बस में आग लग गई। इस हादसे में उनकी भी मौत हो गई। शिनाख्त के लिए बेटे और पिता ने दिया था DNA सैंपल सलीम का शव बुरी तरह जल गया था। शिनाख्त के लिए बेटा अली अब्बास और पिता इसरार हुसैन ने DNA सैंपल दिए थे। 22 दिसंबर को सैंपल मैच होने के बाद उनके शव की पहचान हो सकी। 23 दिसंबर को घरवाले शव लेने पहुंचे। शव को कानपुर देहात के पैतृक गांव दौड़ीबारी रवाना हो गए। पिता की बीमारी पर घर आए थे सलीम इटावा के रहने वाले सलीम भी 19 मरने वालों में शामिल हैं। सलीम नोएडा की एक एक्सपोर्ट कंपनी में सिलाई का काम करते थे। वह पिता की तबीयत खराब होने पर हादसे से 2 दिन पहले इटावा स्थित अपने घर आजाद नगर टीला आए हुए थे। पिता की खैरियत जानने के बाद वह सोमवार शाम को वापस जा रहे थे। उन्होंने नोएडा जाने के लिए शताब्दी ट्रेवेल्स की बस में बुकिंग की थी। लेकिन नोएडा पहुंचने के पहले मथुरा में जिंदा जल गए थे। पिता के शव की शिनाख्त के लिए बेटा-बेटी ने सैंपल दिया हादसे के बाद सलीम के परिवार के लोग उनकी तलाश में मथुरा पहुंचे। मौके पर सलीम का कुछ पता नहीं चला। इसके बाद प्रशासन ने अज्ञात शवों में से सलीम की पहचान के लिए उनके बेटे कलीम और बेटी तबस्सुम का DNA सैंपल लिया। इसका आगरा स्थित लैब में मैच कराया गया। सोमवार को सैंपल मैच कर गया। इसके बाद मंगलवार को शव परिजनों को सौंप दिया गया। रोडवेज बस के ड्राइवर थे सुनील एक्सप्रेस-वे पर हुए हादसे और उसके बाद 9 वाहनों में लगी आग में वह रोडवेज बस भी थी, जो आजमगढ़ से दिल्ली जा रही थी। इस बस को अंबेडकरनगर के रहने वाले सुनील कुमार चला रहे थे। बस में आग लगने से सुनील कुमार की भी मौत हो गई थी। उनकी शिनाख्त के लिए प्रशासन ने 5 साल के बेटे संस्कार और 12 साल की बेटी अंकिता का DNA सैंपल लिया था। 7 दिन रैन बसेरा में रहे सुनील की शिनाख्त के लिए भाई और परिवार के दूसरे लोग अस्पताल से लेकर पोस्टमॉर्टम तक भटके। इस दौरान वह जिला अस्पताल में बने रैन बसेरे में रहे। सोमवार को जब उनका DNA सैंपल मैच हो गया, तब पता चला कि सुनील की भी जलकर मौत हो गई। सही-सलामत मिलने की उम्मीद टूटी, तो सभी गमगीन हो गए। उनकी आंखों से आंसू छलक उठे। मंगलवार को प्रशासन ने शव परिजनों को सुपुर्द कर दिया। इसके बाद परिजन एंबुलेंस से शव को अंबेडकरनगर ले गए। जालौन के राघवेंद्र गाजियाबाद में नौकरी करते थे जालौन के रहने वाले राघवेंद्र (30) गाजियाबाद के मोहन नगर में स्थित जूते-चप्पल की दुकान पर काम करते थे। हादसे से एक हफ्ते पहले ही वह परिवार से मिलने जालौन गए थे। सोमवार को वह जालौन से बस से दिल्ली जा रहे थे। इसी दौरान बस हादसे का शिकार हो गई। इसमें राघवेंद्र की भी जलकर मौत हो गई। उनके छोटे भाई अनिरुद्ध कुमार ने बताया कि उनको एक बेटा और एक बेटी है। परिवार का पालन-पोषण वही कर रहे थे। आंखों में आंसू लिए शव लेकर हुए रवाना राघवेंद्र के शव की पहचान के लिए उनके अनिरुद्ध ने अपना सैंपल दिया था। सोमवार को सैंपल मैच होने की रिपोर्ट आ गई। यह जानकारी मंगलवार को जब अनिरुद्ध कुमार और अन्य परिजनों को मिली तो सभी बिलख पड़े। प्रशासन ने राघवेंद्र का शव सौंपा तो आंखें डबडबा गईं। परिवार आंखों में आंसू लिए शव को लेकर रवाना हुए तो माहौल गमगीन हो गया। ————————- ये खबर भी पढ़िए- ‘मेरा बच्चा मर नहीं सकता, CM बहू-बेटियों की रक्षा करें’: मथुरा हादसे में लापता युवक का मिला कंकाल, मां बोली- कोहरे ने परिवार उजाड़ दिया ”मेरे घर में पहली बार ऐसा कांड हुआ है, मेरा बच्चा सही सलामत घर से गया था, अब उसकी हडि्डयां घर आ रही है… हम तो उसका अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाएंगे। मेरे बच्चे के साथ ऐसा नहीं हो सकता है। भगवान से बहुत दुआ मांगी, मेरा कोई भगवान हीं है… मेरा बेटा मेरा सहारा था, उसका छोटा सा परिवार था, जो कोहरे ने उजाड़ दिया। यह पुकार थी दादानगर सेवाग्राम कॉलोनी में रहने वाली मां लक्ष्मी श्रीवास्तव की। जिनका बड़ा बेटा बीते एक सप्ताह पहले यमुना एक्सप्रेस–वे पर हुए हादसे के बाद से लापता था। पढ़ें पूरी खबर…

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