तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने पिछले दिनों कहा था- मुफ्त में इतनी राशि बांटी जा रही है कि राज्य के पूंजीगत व्यय के लिए राशि बचती ही नहीं है। खबर का आधार यही है कि सरकारी खजाने खाली हो रहे हैं, लेकिन विकास को अपेक्षाकृत गति नहीं मिल पा रही है। यही स्थिति छत्तीसगढ़ में भी है इसलिए दैनिक भास्कर ने यह पड़ताल की, ताकि इस मुद्दे पर एक बहस तो शुरू होनी चाहिए- आखिर मुफ्त में कब तक और कितना सरकारी खजाना खाली होता रहेगा। हर तरफ मुफ्त। जिसमें देखो उसमें सब्सिडी। गरीबों को चावल। महिलाओं को नकदी। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता। किसानों को बोनस। ये कुछ नाम हैं जिनमें सरकार अपने खजाने से लोगों को सीधे लाभ दे रही है या फिर सब्सिडी के जरिए मदद। कुल मिलाकर वोट बैंक की राजनीति में लोगों को बहुत कुछ मुफ्त में मिल रहा है। सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता जा रहा है और अर्थशास्त्र की भाषा में देखें तो पूंजीगत व्यय कम होता जा रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो विकास के बड़े प्रोजेक्ट पर सीधा असर डाल रही हैं। इन सबका जो अप्रत्यक्ष नुकसान हो रहा है वह ऐसा कि पीढ़ियां हुनर से दूर होती जा रही हैं। छत्तीसगढ़ में कुल बजट एक लाख 65 हजार करोड़ रुपए का है। इसमें से करीब 53 हजार करोड़ रुपए से अधिक मुफ्त की योजनाओं या रियायतों पर खर्च हो जाता है। यानी बजट का तकरीबन 32 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त में बंट जाता है। इसी प्रकार 55 हजार करोड़ रुपए वेतन-पेंशन आदि के स्थापना व्यय पर खर्च होता है। इस लिहाज से कुल बजट का 34 प्रतिशत वेतन-पेंशन पर जा रहा है। इस तरह कुल 65 प्रतिशत राशि मुफ्त और सैलरी आदि पर खर्च हो जाती है। इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर यह पड़ रहा है कि राज्य का राजस्व घाटा ही हर साल लगभग 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक का हो रहा है। वह भी तब जब विकास के कामों पर राशि उतनी खर्च नहीं हो रही है जितनी इस नए राज्य को जरूरत है। यह केवल छत्तीसगढ़ राज्य की बात नहीं है अपितु ज्यादातर राज्यों में इस तरह की स्कीम चल रही है। पंजाब, हिमाचल, तेलंगाना जैसे राज्यों में मुफ्त में बांटी जाने वाली राशि और वेतन-पेंशन का प्रतिशत और भी ज्यादा है। इसकी वजह से इन राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ता जा रहा है। छत्तीसगढ़ में भी राजस्व घाटा लगातार बढ़ रहा है। फिलहाल छत्तीसगढ़ की बात करें तो केंद्र सरकार 50 सालों के लिए बिना ब्याज के लोन राज्य सरकार को पूंजीगत व्यय के लिए दे रही है। इस साल छत्तीसगढ़ को 10 हजार करोड़ रुपए इस मद में मिले हैं। पर यह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। केवल यही नहीं, राज्य को अन्य मदों पर आवश्यक कामों पूरा करने के लिए लोन लेना पड़ रहा है। इसका असर 1 कई बड़ी परियोजनाओं के लिए राशि नहीं के बराबर बचती है। 2 युवा पीढ़ी व मजदूर वर्ग को मुफ्त की लत लग गई है, वे काम के प्रति लापरवाह हो रहे हैं। 3 खेतिहर मजदूरों की कमी होती जा रही है, इससे खेती करना दूभर हो रहा है। 4 अन्य कामों जैसे कि घरेलू काम, ड्राइवर और ऑफिस में काम करने वाले नहीं मिल रहे। 5 बड़े सरकारी व निजी प्रोजेक्ट के लिए मेनपॉवर की भारी कमी। मुफ्त की योजनाओं का बड़े प्रोजेक्ट पर असर बजट का 32% हिस्सा मुफ्त में बांटे जाने का असर प्रदेश के विकास पर सीधे हो रहा है। इसकी वजह से राज्य के बड़े प्रोजेक्ट को पूरा करने या चालू करने के लिए अपेक्षित फंड नहीं मिल पा रहा है। ये कुछ उदाहरण हैं … रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट के लिए फंड नहीं
रायपुर के बीच से गुजरी खारून नदी। 107 करोड़ रुपए से इस नदी के दोनों किनारों को संवारना था। वर्षों से मांग के बाद भी सरकार इस काम के लिए बजट नहीं दे पा रही है। छपराटोला परियोजना : कोटा क्षेत्र में दो बांधों के जरिए छपराटोला परियोजना शुरू की जाएगी। 1248 करोड़ रुपए की इस योजना को बजट के अभाव में शुरू नहीं किया जा सका है। इससे अरपा नदी में पानी का संकट नहीं होगा। बिलासपुर शहर को नियमित रूप से पेयजल की सप्लाई हो सकेगी। रायपुर में फ्लाईओवर : रायपुर के मुख्य मार्ग जीई रोड पर 173 करोड़ की लागत से फ्लाईओवर बनाने की योजना इस कारण आगे नहीं बढ़ पा रही है कि फंड मिल ही नहीं पा रहा है। इस फ्लाईओवर के बन जाने से रायपुर शहर की सड़कों पर यातायात का दबाव कम होगा। औद्योगिक क्षेत्र में मजबूत सड़कें नहीं : रायगढ़-कोरबा के औद्योगिक क्षेत्र में भारी वाहनों का आना-जाना लगातार होता रहता है। बावजूद इसके वहां पर अच्छी सड़कें नहीं बनाई जा सकी हैं। फंड के अभाव के चलते अभी इन क्षेत्रों में कच्ची-पक्की सड़कों के जरिए ही सब कुछ चल रहा है। लोगों पर असर… इन्हें अब काम करना नहीं भाता सरकारी योजनाओं और घर में आ रहे मुफ्त के राशन का असर कई लोगों पर नकारात्मक भी हो रहा है। उदाहरण के तौर पर देखें तो धमतरी जिले के सिंगपुर के जीतू केवट ने 10वीं के पास पढ़ाई छोड़ दी। कोई काम नहीं करता। उसका कहना है खाने को तो मिल रहा है ना। घुटकेल गांव के नामू पटेल का मानना है कि कोई काम करने की जरूरत नहीं है। पति-पत्नी के लिए सरकारी राशन पर्याप्त है। सांकरा ग्राम के चोवाराम साहू जरूरत पड़ने पर कोई मजदूरी का छोटा-मोटा काम कर लेता है लेकिन ज्यादातर समय वह घर पर ही बिताता है। समाधान: जिन्हें जरूरत नहीं उन्हें मुफ्त देना बंद कर देना चाहिए भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. रविंद्र ब्रम्हे, प्रोफेसर अर्थशास्त्र समाज में गरीब और अमीर दोनों रहते हैं। मुफ्त की योजनाओं में लाभ केवल उन लोगों को मिलना चाहिए, जिनको जरूरत है। अभी अमीर-गरीब सबको एक तराजू में तौला जा रहा है, जिसकी वजह से राज्य की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर हो रहा है। इसलिए मुफ्त की योजनाएं उन्हीं लोगों के लिए हों जो संकट में हैं और उनको सरकारी मदद की जरूरत है। इसके अलावा योजनाएं ऐसी होनी चाहिए, जिनसे लोगों की कौशल क्षमता में वृदि्ध हो। यह तभी सार्थक हो सकता है, जब व्यक्ति अपने आप को भविष्य के लिए तैयार कर पाए। किसी को जीवनभर के लिए मदद देना कदापि उपयुक्त नहीं है। सरकार की सोच: राज्य की आय बढ़ाने पर काम करना होगा लोकतंत्र में सरकार को गरीबों की तकलीफों को दूर करने के लिए वेलफेयर का काम भी करना होता है। सरकार के कामों में एक ओर सामाजिक संवेदना का ध्यान रखा जाता है साथ ही दूसरी ओर राज्य के विकास को गति देने की जिम्मेदारी भी होती है। इसलिए दोनों कामों के बीच संतुलन बनाते हुए हमें काम करना होता है। इस सोच के साथ ही छत्तीसगढ़ में सरकार काम कर रही है। रही बात बजट की बड़ी राशि खर्च होने की तो उस पर हमें फोकस करते हुए राज्य की आय बढ़ाने पर काम करना होगा। वेलफेयर के काम भी करने होंगे,वहीं पूंजीगत व्यय और औद्योगिक प्रगति के माध्यम से आर्थिक विकास को गति भी देनी होगी। विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प के साथ हम GYAN और GATI दोनों पर काम करने की कोशिश कर रहे हैं। -ओपी चौधरी, वित्त मंत्री छत्तीसगढ़


