‘जीवन को आत्म-कल्याण और जनकल्याण में लगाएं’:भागवत कथा में सती, कपिल और ध्रुव चरित्र का धीरज महाराज ने किया वर्णन

सिरोही में हाउसिंग बोर्ड में चल रही श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ कथा सप्ताह के तीसरे दिन व्यासपीठ से कथावाचक पंडित धीरज महाराज ने सती चरित्र, कपिल चरित्र एवं ध्रुव चरित्र की कथा का वर्णन किया। इस दौरान उन्होंने जीवन को आत्म-कल्याण और जनकल्याण में लगाने का संदेश दिया। महाराज धीरज ने बताया कि सती ने अपने पिता के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान से आहत होकर आत्मदाह कर लिया था। कपिल मुनि ने अपनी माता देवहूति को सांख्य दर्शन का उपदेश दिया। वहीं, ध्रुव ने पिता की गोद में बैठने की इच्छा से कठोर तपस्या कर भगवान से अमर पद प्राप्त किया। ‘जहां अपमान की आशंका हो, उस जगह पर नहीं जाए’
उन्होंने सती चरित्र के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वहां स्वयं का, अपने इष्ट का या अपने गुरु का अपमान न हो। यदि अपमान की आशंका हो, तो ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहिए, भले ही वह अपने जन्मदाता पिता का घर ही क्यों न हो। सती ने भगवान शिव की बात नहीं मानी और पिता से आमंत्रण न मिलने के बावजूद उनके घर गईं, जहां अपमानित होने के बाद उन्हें स्वयं को अग्नि में भस्म करना पड़ा। ‘धैर्य और संयम बहुत जरूरी’
उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा सुनाते हुए धीरज महाराज ने बताया कि ध्रुव को उनकी सौतेली मां सुरुचि द्वारा अपमानित किए जाने पर भी उनकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया। इससे एक बड़ा संकट टल गया। उन्होंने कहा कि परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य और संयम की नितांत आवश्यकता होती है। भक्त ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा के माध्यम से उन्होंने बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं होती।

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