भास्कर न्यूज | जालंधर 40 वर्षों की शोध के बाद पंजाब के बौद्ध इतिहास को सहेजते हुए बौद्ध स्कॉलर हरमेश लाल ने पुस्तक तैयार की। पुस्तक के पहले भाग में महामानव भगवान बुद्ध के पंजाब आगमन से लेकर महाराजा हर्षवर्धन के शासनकाल तक का विस्तृत वर्णन किया गया है। नागलोक ने सबसे पहले बुद्ध धम्म को अपनाया, उनके राज्यों और विरासत के बारे में भी पंजाब के संदर्भ में पहली बार जानकारी दी गई। पुस्तक के दूसरे भाग में सिंधु घाटी सभ्यता, प्राचीन सिक्कों और मुहरों के आधार पर पंजाब की बौद्ध विरासत को प्रमाणित किया गया है। पुस्तक का विमोचन रविवार दोपहर डॉ. अंबेडकर भवन में डॉ. सुरिंदर अज्ञात द्वारा किया जाएगा। जालंधर के प्राचीन इतिहास का विस्तृत उल्लेख हरमेश लाल की पुस्तक के अनुसार चीनी यात्री ह्यूनसांग राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में जालंधर आए थे। जालंधर के राजा ओदितो ने उनकी सुरक्षा और मेहमाननवाज़ी की। चूंकि ओदितो ने बौद्ध धर्म अपना लिया था, महाराजा हर्षवर्धन ने उन्हें क्षेत्र का सरपरस्त नियुक्त किया। ह्यूनसांग ने लिखा कि उस समय जालंधर में 50 बौद्ध विहार और 2000 भिक्षु थे। उन्होंने जालंधर का नाम ‘चेलांतरो’ बताया। ह्यूनसांग जालंधर में चार महीने रहे और अभिधम्म शास्त्र का अध्ययन किया। उस समय जालंधर का क्षेत्रफल पूर्व-पश्चिम 167 मील और उत्तर-दक्षिण 133 मील था। सुलतानपुर लोधी भी जालंधर क्षेत्र का हिस्सा था, जिसका प्राचीन नाम सर्वमानपुर था और ह्यूनसांग ने इसे ‘तामसबण’ कहा। यहां 300 भिक्षु रहते थे और विहार चार किलोमीटर में फैले हुए थे। वर्तमान किला सराय के स्थान पर तामसबण बौद्ध विहार था, जहां चौथी बौद्ध संगति आयोजित हुई थी। 500 भिक्षुओं ने इसमें भाग लिया और बौद्ध शास्त्र ताम्र पत्रों पर लिखकर पत्थर के संदूकों में सुरक्षित किए गए। साल 1969 में सुल्तानपुर लोधी से बौद्ध मूर्ति, मुहरें और सिक्के मिले। मूर्ति का वजन 4 किलो था। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1616 में जारी आधा आना का सिक्का भी मिला, जिस पर भगवान बुद्ध की आकृति अंकित थी। यह सिक्का सपरोट नंगल गांव में नाग लोगों के टीले के पास पाया गया।


