जो पेड़ सरकारी फाइलों में कल तक मौजूद नहीं थे, वे अचानक जमीन पर नजर आने लगे…और वो भी पूरे 13 एकड़ में। मामला भोपाल से 15 किमी दूर बैरसिया के मस्तीपुरा गांव का है, जहां मुरम-कोपरा खदान को नियमों को दरकिनार कर मंजूरी दे दी गई। दैनिक भास्कर द्वारा मामला उजागर किए जाने के बाद प्रशासन हरकत में आया। खनिज, वन, राजस्व, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासन के अफसर मौके पर पहुंचे। निरीक्षण के दौरान अफसरों को भी मानना पड़ा कि क्षेत्र में हजारों की संख्या में सागौन सहित अन्य प्रजातियों के पुराने पेड़ मौजूद हैं। अनुमान के मुताबिक यहां 6 हजार से अधिक पेड़ खड़े हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब मौके पर इतना घना जंगल मौजूद था, तो फिर 17 एकड़ जमीन पर खनन की अनुमति कैसे दे दी गई? क्या खदान की सभी एनओसी सिर्फ कागजों पर जारी कर दी गईं? क्या वास्तव में कभी मौके मुआयना हुआ भी था या फाइलों में ही जंगल ‘गायब’ कर दिया गया? हैरानी की बात यह है कि राजस्व विभाग की रिपोर्ट में पहले ही पेड़ों की मौजूदगी का स्पष्ट उल्लेख था, इसके बावजूद संबंधित विभागों ने आंख मूंदकर एनओसी जारी कर दी। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर कलेक्टर से अनुमति ली गई, ऐसे में यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या उन्हें जमीनी सच्चाई से अवगत कराया गया था या नहीं। सूत्रों के मुताबिक इस पूरे मामले में खनिज विभाग और सिया की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध मानी जा रही है। कदम-कदम पर लापरवाही… सबके सामने सच था, लेकिन किसी ने सही जानकारी नहीं दी खनिज विभाग पर्यावरण विभाग वन विभाग पंचायत विभाग राजस्व विभाग अनुमति निरस्त करने का प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। एक भी पेड़ नहीं कटने दिए जाएगा। रिपोर्ट के आधार ये कार्रवाई की जा रही है।-कौशलेंद्र विक्रम सिंह, कलेक्टर


