ओसीडी यानी ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर, एक मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति किसी विशेष विचार या आदत को लेकर इतना ओब्सेस्ड हो जाता है कि यह उसकी दिनचर्या और मानसिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित करता है। यह विकार किसी भी उम्र में हो सकता है और इसके शिकार व्यक्ति अक्सर अपनी सोच और व्यवहार पर नियंत्रण खो देते हैं। शहर में भी ओसीडी के मामले बढ़ रहे हैं, जहां लोग कई तरह की मानसिक उलझनों और विकृतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसा ही एक मामला शहर के एक युवा का सामने आया, जिसे अपने गोरेपन को लेकर भ्रम हो गया था। वह सोचता था कि उसका रंग उतना गोरा नहीं है जितना उसे चाहिए। उसकी इस समस्या से ही गोरेपन के जुनून ने जिंदगी को उलझन भरा कर दिया। दिमाग की उलझनों को समझें, पहचानें और संभलें डॉ. जगजोत सिंह मनोचिकित्सक बताते हैं कि ओसीडी एक मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति किसी एक विचार, भावना या आदत को लेकर इतना ओब्सेस्ड हो जाता है कि उसका दिमाग बार-बार उसी बात पर अटक जाता है। इस केस में युवक अपने रंग को लेकर ओब्सेस्ड था। बार-बार डॉक्टरों से संपर्क करना, पैसा खर्च करना और फिर भी संतुष्टि न मिलना, यह दर्शाता है कि उसका दिमाग इस विचार के जाल में फंस गया था। ओसीडी के इलाज के लिए दवाइयों के साथ-साथ काउंसलिंग और कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) का सहारा लिया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को पहचानना और समझना बेहद जरूरी है। कई बार लोग इन विकारों को सामान्य मानकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने से यह विकार और गंभीर हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर ही इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। दिमाग की उलझनों को समझें, पहचानें और संभलें। दिमाग पर इतना गहरा असर कि सामान्य जीवन जीने में हो गया असमर्थ 25 वर्षीय युवक गोरी त्वचा होने के बावजूद खुद को लेकर असंतुष्ट था। उसे लगता था कि उसके चेहरे का रंग उसकी छाती की त्वचा से मेल नहीं खाता। इस भ्रम के कारण उसने 15 से ज्यादा स्किन स्पेशलिस्ट से संपर्क किया और लाखों रुपये खर्च कर दिए। हर डॉक्टर से वह यही कहता कि उसकी त्वचा को पूरी तरह गोरा बना दें। उसने महंगे ट्रीटमेंट लिए, लेकिन संतुष्टि नहीं मिली। उसकी यह आदत उसकी सोच और व्यवहार पर हावी हो गई। युवक अपनी महिला दोस्तों से बार-बार पूछता कि वह स्मार्ट और गोरा दिखता है या नहीं। इस सवाल का जवाब न मिलने पर वह मानसिक तनाव में रहने लगा। इस सोच ने उसके दिमाग पर इतना गहरा असर डाला कि वह सामान्य जीवन जीने में असमर्थ हो गया। जब स्थिति हाथ से बाहर हो गई, तो उसने अपने परिवार को अपनी समस्या बताई। परिवार ने उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले जाने का फैसला किया। जांच के बाद पता चला कि वह ओसीडी का शिकार हो गया था। सही इलाज और समय पर परामर्श से युवक ठीक हो पाया।


