सेवादार चरणजीत सिंह ने बताया कि गुरु अर्जुन देव जी महाराज के घर गुरु की वडाली में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी महाराज का जन्म हुआ था। जिसके बाद गुरुसाहिब के प्रकाशोत्सव पर हर साल सालाना मेला लगता है। जिसमें दूर दराज से नगर कीर्तन और संगत आकर माथा टेकती है और धार्मिक दीवान भी सजाए जाते हैं। इसी गांव में गुरुद्वारा दमदमा साहिब और गुरुद्वारा शहीद सिंघां भी है। गुरु की वडाली में गुरुद्वारा श्री मंजी साहिब। सतीश कपूर | अमृतसर अमृतसर से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित गांव गुरु की वडाली को पंचम पातशाह और छठे पातशाह की चरण धुली प्राप्त है। इस गांव का नाम वडाली हुआ करता था। परंतु पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज के आने के बाद गुरु की वडाली पड़ा । शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन चलने वाले गुरुद्व्रारा श्री छेहर्टा साहिब में जो भी संगत माथा टेकने जाती है वह गुरु की वडाली के गुरुद्वारा साहिब के दर्शनों को जरूर पहुंचती है। एसजीपीसी की तरफ से गांव गुरु की वडाली में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी महाराज के गुरुद्व्र्रारा जन्म स्थान के बाहर इतिहास लिखा है। गुरु की वडाली के गुरुद्वारा जन्म स्थान के सेवादार चरणजीत सिंह के मुताबिक श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज गुरु के महल से गांव गुरु की वडाली में आकर संगत को मंजी में बैठकर लंगर ग्रहण करवाया करते थे। वहां गुरुद्व्रारा मंजी साहिब बना है। इतिहास के मुताबिक यहां आज भी शहीद सिंहों का पहरा लगता है। गुरुद्व्रारा श्री शहीदां साहिब की तरह ही गांव गुरु की वडाली में भी लोग गुरुद्वारा शहीद सिंघां में दोपहर को चौपहरा काटते हैं। एसजीपीसी के अनुसार पंचम पातशाह ने भाई भागू जी, भाई ढोल जी और भाई खान जी सहित गांव की संगत के कहने पर वडाली में निवास किया। गुरु की वडाली में गुरुद्वारा जन्म स्थान। गुरु की वडाली में गुरुद्वारा श्री शहीद सिंंघां।


