5 करोड़ रुपए खर्च कर भवन बनाया, न कोर्स शुरू और ना ही शिक्षकों की नियुक्ति

वैदिक परंपरा के संरक्षण का दायित्व जिस जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय को सौंपा गया था, वही विश्वविद्यालय अपनी प्रशासनिक विफलता के कारण सवालों के घेरे में है। विश्वविद्यालय में डेढ़ दशक पहले स्थापित राजस्थान मंत्र प्रतिष्ठान पूरी तरह से निष्क्रिय है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई मंत्र प्रतिष्ठान की इमारत पर धूल जमी पड़ी है।इसमें न कोई शिक्षक है, न कर्मचारी, न पाठ्यक्रम और न ही कोई छात्र। वर्ष 2008 में वसुंधरा सरकार की बजट घोषणा के तहत स्थापित मंत्र प्रतिष्ठान के भवन निर्माण पर पांच करोड़ रुपए से अधिक धनराशि खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद 17 साल बाद भी यहां कोई शैक्षणिक गतिविधि प्रारंभ नहीं हुई। कई कुलपति और कुलसचिव बदले, पर परिणाम शून्य है। विधानसभा में डीडवाना विधायक ने उठाया सवाल, शिक्षा विभाग का जवाब- नियुक्ति नहीं हुई {विश्वविद्यालय की ओर से वर्ष 2012 और 2017 में नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। प्रतिष्ठान में कोई अध्ययन-अध्यापन व शोध नहीं हो रहा है। यह केवल कागजी औपचारिकता बनकर विश्वविद्यालय के सामने अनसुलझा सवाल बनकर रह गया है। विधानसभा में डीडवाना विधायक यूनुस खान के सवाल पर संस्कृत शिक्षा विभाग की ओर से दिए जवाब में सरकार ने स्वीकारा है कि प्रतिष्ठान में कोई नियुक्ति नहीं हुई है, जिससे इसका संचालन नहीं हो पा रहा है। विश्वविद्यालय के ही विभिन्न शिक्षकों को बारी-बारी से निदेशक का चार्ज देकर केवल खानापूर्ति की जा रही है। लेखा विभाग ने अपने प्रतिवेदन में भी मंत्र प्रतिष्ठान की दुर्दशा से हुए वित्तीय नुकसान पर सवाल खड़े किए हैं। राजभवन व सरकार भी इस ओर ध्यान दें संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रशासन ने करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए मंत्र प्रतिष्ठान को औचित्यहीन बना डाला है। विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर राजभवन और सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए। साथ ही, वैदिक शिक्षा के प्रसार में बाधा पहुंचाने वाले अधिकारियों पर कार्यवाही कर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। -यूनुस खान, विधायक, डीडवाना

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