भास्कर न्यूज | बालोद नयापारा स्थित सत्संग भवन में चल रही श्रीराम कथा के अंतर्गत केवट प्रसंग का समापन करते हुए डॉ. आरडी दास वैष्णव ने इस प्रसंग के आंतरिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक भावों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि केवट प्रसंग रामचरितमानस का अत्यंत भावुक और शिक्षाप्रद प्रसंग है, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। कथावाचन में बताया गया कि जब भगवान श्रीराम गंगा पार कर गए और केवट ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया, तब श्रीराम ने माता सीता द्वारा दी गई मुद्रिका उतराई स्वरूप देना चाही, लेकिन केवट ने किसी भी प्रकार की उतराई लेने से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। केवट ने भावुक होकर कहा कि प्रभु, आज मुझे आपकी कृपा से सब कुछ प्राप्त हो गया है, अब मुझे किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं है। डॉ. वैष्णव ने समझाया कि दरिद्रता दो प्रकार की होती है आंतरिक और बाह्य। बाह्य संपन्नता होते हुए भी व्यक्ति आंतरिक रूप से दरिद्र हो सकता है, जैसे रावण, जबकि बाह्य रूप से अभावग्रस्त होकर भी व्यक्ति आंतरिक रूप से भक्ति-धन से संपन्न हो सकता है, जैसे विभीषण और सुदामा। केवट ने भी स्वयं को बाह्य रूप से अभावग्रस्त लेकिन प्रभु कृपा से आंतरिक रूप से संपन्न बताया। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीराम भक्तों के बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि उनके आंतरिक प्रेम और समर्पण को महत्व देते हैं। इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कागभुसुंडि और दशरथ जी का प्रसंग भी श्रोताओं के समक्ष रखा गया। श्रीराम उस भक्त के पास जाते हैं जो निस्वार्थ भाव से उनकी प्रतीक्षा करता है। श्रीराम ने केवट को बिमल भक्ति का वरदान दिया: कथावाचक ने बताया कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण तीनों ने केवट को उतराई देने का प्रयास किया, जो क्रमशः ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के प्रतीक हैं, लेकिन केवट ने सब कुछ अस्वीकार कर केवल प्रभु कृपा को ही पर्याप्त माना।


