आदिवासियों की मदद के बहाने सरकारी जंगल व पहाड़ कब्जाए:8000 एकड़ जंगल पर कब्जा, 10 हजार आदिवासी खुद की जमीन पर मजदूर

हरदा जिले के टिमरनी में फैला राजा बरारी एस्टेट सवाल खड़ा करता है कि देश में कानून बड़ा है या रसूख। सुप्रीम कोर्ट के 15 मई 2025 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यहां 8000 एकड़ का पूरा वन क्षेत्र निजी एस्टेट की तरह संचालित हो रहा है। इसी क्षेत्र में 4500 एकड़ सघन जंगल शामिल है, जहां से हर साल सागौन समेत अन्य कीमती लकड़ियों की कटाई होती है। सुप्रीम कोर्ट निजी संस्थाओं के कब्जे या लीज वाले जंगलों को वन विभाग को लौटाने का आदेश दे चुका है, पर मध्यप्रदेश में स्थिति जस की तस बनी हुई है। आखिर विवाद क्या है…? : राजा बरारी एस्टेट की कहानी अंग्रेजी शासन से शुरू होती है। दावा है कि 1919 में अंग्रेज अधिकारी विनीफ्रेड मरे की पत्नी फ्रांसिस मरे ने यह एस्टेट राधास्वामी सत्संग के गुरु आनंद स्वरूप को बेचा। 1924 में इसे संस्था को दान कर दिया गया। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हुआ, पर यह एस्टेट सरकारी संपत्ति में शामिल नहीं हुआ। इसके बजाय 1951 में आदिवासी उत्थान का आधार बताकर पूरे वन क्षेत्र को 99 साल की लीज पर दे दिया गया। समय के साथ लीज की शर्तें बदलीं। 1956 में सप्लीमेंट्री लीज लाई गई, 1973 में वन भूमि पर शाश्वत पट्टा दे दिया गया और 1983 में लीज राधास्वामी ट्रेनिंग, एम्प्लॉयमेंट एंड आदिवासी अपलिफ्ट इंस्टीट्यूट के नाम कर दी गई। नतीजा- जंगल सरकारी होते हुए भी निजी नियंत्रण में चला गया। अभी इस 8000 एकड़ वन क्षेत्र से होने वाली लकड़ी कटाई का प्रमाणीकरण वन विभाग करता है, पर बिक्री की रकम निजी संस्था को चुकाई जाती है। हर साल यह भुगतान एक करोड़ रुपए से ज्यादा का होता है, जबकि लीज के एवज में संस्था सरकार को सिर्फ 12.25 लाख रु. सालाना देती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वन विभाग ने लकड़ी कटाई का भुगतान रोका व करीब 1.02 करोड़ रु.अटक गए, पर कुछ समय बाद यह राशि फिर जारी कर दी गई। हैरत की बात है कि आदिवासी उत्थान के नाम पर बनाई गई व्यवस्था के कारण राजा बरारी एस्टेट के भीतर 10 गांवों के 10 हजार से ज्यादा आदिवासी उसी जमीन पर मजदूर हैं, जिसके कभी वे पैतृक मालिक थे। आरक्षित वन भूमि किसी भी निजी संस्था या व्यक्ति के कब्जे में नहीं रह सकती। ऐसी भूमि को तत्काल वन विभाग को लौटाना राज्य सरकार का दायित्व है।’
– 15 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश यह जमीन हरदा मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर है। यह सतपुड़ा की तलहटी में है। सरकार के अपने ही विभागों की रिपोर्ट… इसमें गंभीर अनियमितताएं, इस लीज की केंद्र से मंजूरी ही नहीं ली संभाग आयुक्त की रिपोर्ट भी लीज पर सवाल उठा चुकी है। वर्ष 2011 में नर्मदापुरम और भोपाल संभाग के तत्कालीन संभागायुक्त की जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया कि राजा बरारी एस्टेट की लीज में गंभीर अनियमितताएं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लीज स्वीकृत करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी नहीं ली गई। 1953 और 1956 में लीज का पंजीयन तक नहीं कराया गया और वन भूमि पट्टा कानून का गलत लाभ दिया गया। यह रिपोर्ट राजस्व बोर्ड, मुख्य सचिव और वन विभाग को भेजी गई, पर इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई। वन विभाग ने भी कई बार शासन को पत्र लिखकर कहा कि लीज का उद्देश्य अब पूरा नहीं हो रहा और वन भूमि उसे सौंपी जानी चाहिए, पर शासन स्तर पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया। भास्कर के साथ मौके पर एक्सपर्ट
पूर्व पीसीसीएफ बोले- वन क्षेत्र में निजी भूमि शामिल करना गलत, लीज रद्द हो राजा बरारी एस्टेट में वन क्षेत्र को शामिल करना पूरी तरह गलत है। यह लीज तत्काल प्रभाव से निरस्त होनी चाहिए। वन भूमि को वर्षों पहले ही वन विभाग को सौंप दिया जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रहना सिस्टम की विफलता है। आदिवासी उत्थान के नाम पर जो किया गया, वह नाकाफी ही नहीं, बल्कि दिखावटी है।’
-आजाद सिंह डबास, सेवानिवृत्त एडिशनल पीसीसीएफ

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *