फल उत्पादकों को रोगमुक्त पौधों के बारे में जानकारी मिलेगी

लुधियाना। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पी.ए.यू.) में बागवानी क्षेत्र से जुड़े पौधशाला (नर्सरी) उत्पादन और बागों की देखरेख पर आधारित पुस्तक श्रृंखला के नए अंकों का लोकार्पण किया गया। पीएयू के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने श्रृंखला के दूसरे और तीसरे अंक का औपचारिक रूप से विमोचन किया। इस त्रि-श्रृंखला के सभी अंक डॉ. विसाखा सिंह ढिल्लों द्वारा लिखे गए हैं। यह पुस्तक श्रृंखला बागवानी क्षेत्र में ज्ञान का विस्तार करती है और नर्सरी उत्पादन, बागों की देखरेख और कैनोपी प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर नवीन जानकारी प्रस्तुत करती है। इसके माध्यम से फलों के उत्पादन में गुणवत्ता और मात्रा दोनों स्तरों पर वृद्धि संभव होगी। नए जारी किए गए अंकों में भारत सरकार की विभिन्न राष्ट्रीय योजनाओं के तहत बागों की स्वच्छ और वैज्ञानिक देखरेख पर विशेष प्रकाश डाला गया है, जिससे फल उत्पादकों को स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों के बारे में व्यापक जानकारी मिलेगी। श्रृंखला के पहले अंक में सहायक क्षेत्रों से संबंधित जानकारी दी गई है, जबकि दूसरा अंक तापमान और गर्म-शुष्क क्षेत्रों की फल फसलों पर केंद्रित है। ये तीनों पुस्तकें नवीन ज्ञान और तकनीकों को समग्र रूप से प्रस्तुत करती हैं, जिससे विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में फलों के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। पुस्तकों के विमोचन अवसर पर कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कहा कि यह त्रि-श्रृंखला भारतीय बागवानी को नई दिशा देने में सक्षम है। इनके माध्यम से न केवल उत्पादन में नई ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है, बल्कि पौधशाला की वैज्ञानिक पैदावार, बागों की रोपाई व देखरेख, कीट एवं रोग प्रबंधन द्वारा स्वस्थ फसल उत्पादन भी संभव होगा। उन्होंने कहा कि बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए वैज्ञानिक खेती का मार्ग इन पुस्तकों से स्पष्ट होता है। { विद्यार्थियों, शिक्षकों, उत्पादकों के लिए अत्यंत उपयोगी: पुस्तकों के बारे में जानकारी देते हुए लेखक डॉ. विसाखा सिंह ढिल्लों ने पौधशाला उत्पादन से लेकर बागों की संपूर्ण देखभाल तक फसल उत्पादन में चरणबद्ध समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक फल उत्पादन के क्षेत्र में तकनीकी रूप से सतर्क रहना और नई तकनीकों को अपनाना आवश्यक है, तभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा संभव होगी। उन्होंने इन पुस्तकों को विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और पेशेवर पौधशाला उत्पादकों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

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