हंट्समैन स्पाइडर के काटने पर गलने लगा था मांस:आयुर्वेद संस्थान के डॉक्टरों ने जहर का तलाशा आयुर्वेदिक तोड़, ​​​तालाब और नदी किनारे रहती है यह मकड़ी

मध्यप्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में पाए जाने वाले हंट्समैन स्पाइडर को आमतौर पर खतरनाक नहीं माना जाता, लेकिन हालिया मेडिकल रिपोर्ट और आयुर्वेदिक केस-स्टडी इस धारणा को चुनौती देती है। पंडित खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान से पीजी कर रही 28 वर्षीय युवती के मामले ने यह साफ कर दिया है कि मकड़ी का काटना केवल मामूली खुजली या लालिमा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह तेजी से बढ़ने वाले नेक्रोटिक घाव यानी मांस को गलाने वाली स्थिति में भी बदल सकता है। इस केस में खास बात यह रही कि आधुनिक सर्जरी या एंटीबायोटिक के बजाय पूरी तरह आयुर्वेदिक इलाज से मरीज को ठीक किया गया। पीजी स्टूडेंट की तरह कलियासोत डेम से सटी बस्ती की रहने वाली 32 वर्षीय महिला भी हाल ही में इसी मकड़ी की चपेट में आई। जिसे भी बिना पेनकिलर दवाएं दिए, सिर्फ आयुर्वेदिक इलाज से ठीक किया गया। इन केस की रिपोर्ट जर्नल ऑफ आयुर्वेद में प्रकाशित की गई है। दरअसल, इस मकड़ी को आमतौर पर हार्मलेस जीव माना जाता है। जबकि यह स्टडी बताती है कि इसके काटने पर भी गंभीर घाव हो सकते हैं। ऐसे में समय रहते इलाज जरूरी है। आमतौर पर सोते समय करती है हमला
हंट्समैन मकड़ी रात में सक्रिय होती है। ऐसे में सोते हुए लोग ही ज्यादातर इसका डंक को झेलते हैं। खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान की पीसी स्टूडेंट के अनुसार वह रात में शॉर्ट्स पहनकर सो रही थी। नींद के दौरान उसे पैर पर कुछ रेंगने जैसा महसूस हुआ, लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कुछ घंटों बाद बिस्तर पर एक मृत मकड़ी मिली और पैर के पिछले हिस्से पर दो गोल लाल निशान नजर आए। शुरुआती समय में न तो दर्द था और न ही कोई गंभीर लक्षण। अगली सुबह स्थिति बदल चुकी थी। पैर के पिछले हिस्से और पिंडली के ऊपर वाले हिस्से में तेज जलन, दर्द और खुजली शुरू हो गई। देखते ही देखते दोनों घावों के बीच में नीलापन और गड्ढे जैसी संरचना बनने लगी। यह संकेत था कि जहर त्वचा के अंदर तेजी से असर कर रहा है। गलने लगा था मांस
डॉक्टरों की जांच में यह सामने आया कि यह सामान्य स्पाइडर बाइट नहीं, बल्कि डर्मो-नेक्रोटिक लेजन है। मेडिकल साइंस के अनुसार, कुछ मकड़ियों के जहर में ऐसे तत्व होते हैं जो रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे उस हिस्से में खून का प्रवाह रुक जाता है और त्वचा व मांस धीरे-धीरे मरने लगती है। रिपोर्ट के अनुसार, तीसरे दिन तक घावों के किनारों पर फफोले बनने लगे और बीच का हिस्सा नीला-काला पड़ने लगा। सातवें दिन तक दोनों घाव पूरी तरह नेक्रोटिक हो गए, यानी उस हिस्से की त्वचा मृत हो चुकी थी। ऐसे तलाशा आयुर्वेदिक इलाज
आयुर्वेद में मकड़ी के काटने को ‘लूता विष’ कहा गया है। अगद तंत्र (आयुर्वेदिक विष विज्ञान) में लूता विष का विस्तृत वर्णन मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, मकड़ी का जहर वात, पित्त और कफ में असंतुलन पैदा करता है। इस केस में डॉक्टरों ने इसे पित्त-कफ प्रधान लूता विष माना, क्योंकि मरीज को जलन, लालिमा, सूजन, खुजली और तेज दर्द था। आयुर्वेदिक ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि मकड़ी का विष केवल काटने से ही नहीं, बल्कि उसके लार, मूत्र या शरीर के संपर्क से भी असर कर सकता है। इलाज में काढ़ा, अगद और घृत का उपयोग दोनों मरीजों का इलाज पूरी तरह ओपीडी स्तर पर किया गया। शुरुआत में उसे गुडूच्यादि कषाय दिया गया, जो शरीर से विष को बाहर निकालने और पित्त-कफ को शांत करने में सहायक माना जाता है। इसके साथ विल्वादी अगद दिया गया, जो आयुर्वेद में विषनाशक औषधि के रूप में जाना जाता है। घावों को दिन में दो बार त्रिफला कषाय से धोया गया। इसके बाद शतधौत घृत लगाया गया, जो जलन कम करने और त्वचा को ठंडक देने में मदद करता है। डॉक्टरों ने मरीज को मसालेदार, खट्टा और मांसाहारी भोजन से परहेज करने की सलाह दी। साथ ही पैर को ऊंचा रखकर आराम करने को कहा गया, ताकि सूजन कम हो सके। पांचवें दिन बढ़ा दर्द, बुखार के लक्षण
इलाज के चौथे दिन जलन में कुछ कमी आई, लेकिन घाव की नेक्रोसिस बढ़ती रही। पांचवें दिन मरीज को हल्का बुखार और दर्द बढ़ने की शिकायत हुई। इसके बाद इलाज में सूर्यप्रभा गुटिका जोड़ी गई, जिसे आयुर्वेद में ज्वर और दर्द नियंत्रित करने वाली औषधि माना जाता है। सातवें दिन तक दोनों घाव पूरी तरह गल चुके थे। इसके बाद डॉक्टरों ने मृत ऊतक को सावधानीपूर्वक हटाया और घाव पर महातिक्तक घृत लगाया गया, जो घाव भरने में सहायक माना जाता है। 17वें दिन पूरी तरह भरा घाव, 21 दिन में इलाज बंद
लगातार निगरानी और उपचार के बाद 17वें दिन तक घाव पूरी तरह भर गया। दबाने पर दर्द नहीं था और किसी तरह का संक्रमण भी नहीं दिखा। 21 दिन बाद सभी मुख्य दवाएं बंद कर दी गईं। इसके बाद शरीर में बचे संभावित विष को खत्म करने के लिए दूषीविषारी अगद और हरिद्राखंड दिया गया। त्वचा पर पड़े काले निशान को हल्का करने के लिए एलादी केर तैलम का उपयोग किया गया। इलाज के दौरान किसी भी तरह का साइड इफेक्ट सामने नहीं आया । मॉडर्न मेडिसिन और आयुर्वेद में अलग-अलग इलाज
मॉडर्न मेडिसिन में ऐसे मामलों में प्राथमिक उपचार के साथ-साथ दर्द निवारक दवाएं, एंटीबायोटिक और गंभीर स्थिति में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। कुछ मामलों में घाव भरने में कई हफ्ते या महीने लग जाते हैं। इस केस-स्टडी में यह सामने आया कि सही समय पर और सही तरीके से दिया गया आयुर्वेदिक इलाज न केवल जहर को सीमित कर सकता है, बल्कि घाव को बिना सर्जरी के भरने में भी सक्षम है। 12 सेमी तक हो सकती है मकड़ी
हंट्समैन स्पाइडर मुख्य रूप से मध्यभारत से दक्षिण भारत तक में देखने को मिलती है। पैरों को पूरा खोलने पर यह 7 से 12 सेमी तक हो सकती है। भूरे रंग की यह मकड़ी गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में पनपती है। लक्षण: इसके काटने पर हाई ब्लड प्रेशर, एंग्जायटी, सिरदर्द, बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, मकड़ी जहां काटी है उस जगह तेज दर्द और त्वचा जलने लगती है।

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