रेलवे स्टेशन से खरीदी किताब से बने ‘शहदवाले’:लीची और जामुन के फ्लेवर का भी हनी; मधुमक्खी पालन से 16 लाख की कमाई

कभी खेतों की चिंता थी, तो कभी रोजगार की तलाश। फिर रेलवे स्टेशन पर मिली एक किताब ने ‘शहदवाला’ बना दिया। करीब 23 साल में मधुमक्खी पालन को स्टार्टअप में बदलकर बहरोड़ के रामकिशोर यादव (50) आज 16 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं। नेचुरल फ्लेवर वाले शहद की इंटरनेशनल मार्केट में भी डिमांड है। पिता के साथ बेटा भी इस मॉडल को आगे बढ़ा रहा है। मुनाफे के मॉडल को सीखकर कई लोग अपना चुके हैं। खेती-किसानी में आज बहरोड़ के किसान रामकिशोर यादव की बात… रामकिशोर यादव बताते हैं- साल 1994 में ग्रेजुएशन कर लिया था। इसके बाद रोजगार के लिए काफी परेशान होना पड़ा। परिवार में तीन भाईयों में सबसे बड़े होने के कारण जिम्मेदारियों का बोझ भी उन्हीं पर था। शुरुआत में गांव में जनरल स्टोर की दुकान खोली। इसके बाद कोटकासिम और हरियाणा के बूढ़ी बावल स्थित एक गौशाला में करीब 11 महीने तक मैनेजर के पद पर काम किया। किताबें पढ़ने का शौक रहा है। सितंबर 2002 में अलवर रेलवे स्टेशन पर घूमते समय किताब खरीदी- ‘भोपाल उद्यमिता विकास’। इस किताब में मधुमक्खी पालन (बी-कीपिंग) और छोटे व्यवसायों की जानकारी दी गई थी। यही किताब उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। ट्रेनिंग लेकर शुरू किया मधुमक्खी पालन किताब पढ़ने के बाद उन्होंने मधुमक्खी पालन को अपनाने का फैसला किया। इसके लिए अलवर से बी-कीपिंग की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद 30 अक्टूबर 2002 को सरसों के सीजन में अपने साथी पप्पूराम के साथ मिलकर 58 बॉक्स से मधुमक्खी पालन की शुरुआत की। अपने ही खेत में मधुमक्खियों के बॉक्स लगाए। एपीस मेलीफेरा से की शुरुआत, पहले ही साल निकली लागत शुरुआत में जोखिम जरूर था, लेकिन मेहनत रंग लाई। भारत में मुख्यत: बी कीपिंग के लिए तीन तरह की मधुमक्खी है। इनमें एपीस मेलीफेरा अच्छी है। ये शांत स्वभाव की होती है। पहले से बी कीपिंग कर रहे किसान से एपीस और मेलीफेरा खरीदी थी। पहली बार शहद को 74 रुपए प्रति किलो के भाव से बेचा और उसी से लागत और संसाधनों की भरपाई कर ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार मेहनत, अनुभव और सही प्रबंधन के चलते आज उनके पास करीब 2700 मधुमक्खी बॉक्स हैं। एक बॉक्स से 3 किलो तक शहद निकलता है रामकिशोर ‘शहदवाले’ बताते हैं कि एक बी-कीपिंग बॉक्स में 10 छत्ते होते हैं। एक महीने में एक बॉक्स से औसतन 3 किलो शहद निकाला जाता है। वर्तमान समय में शहद का बाजार भाव 80 से 90 रुपए प्रति किलो है। इससे अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। इसके साथ ही खेती से भी उनकी आय बनी हुई है। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा व्यवसाय अब इस व्यवसाय को उनके बेटे यशवर्धन आगे बढ़ा रहे हैं। इससे यह काम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रहा है। रामकिशोर यादव आज न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि कई युवाओं को ट्रेनिंग देकर रोजगार की राह भी दिखा चुके हैं। कई फ्लेवर का शुद्ध शहद रामकिशोर यादव ने बताया- नेचुरल तरीके से सफेदा, सरसों, लीची, जामुन, सौंफ, अजवायन, देसी कीकर और जंगली पेड़-पौधों से शहद के फ्लेवर तैयार किए जाते हैं। फ्लेवर फसलों और पेड़ों के फूलों से चुने गए शहद से स्वाभाविक रूप से आते हैं। इससे मक्खियां जिस तरह के फूल या पेड़ों से पराग लेकर आती है और उसी फ्लेवर शहद तैयार होता है। फ्लेवर की डिमांड के अनुसार अलग-अलग जगह जाकर खेतों के पास बॉक्स लगाए जाते हैं। मधुमक्खियां सिर्फ शहद ही नहीं, कई कीमती उत्पाद देती हैं … मधुमक्खियां केवल शहद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनसे कई ऐसे उत्पाद मिलते हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद, दवाइयों, कॉस्मेटिक और फूड इंडस्ट्री में किया जाता है। इनमें शहद, मोम, पोलन, प्रोपोली, रॉयल जेली और बी-वेनम शामिल हैं। इन उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग और ऊंची कीमत है। शहद: ऊर्जा और सेहत का प्राकृतिक स्रोत मधुमक्खियों से मिलने वाला सबसे प्रमुख उत्पाद शहद है। आयुर्वेद में इसे योगवाही माना जाता है, यानी जिसके साथ लिया जाए उसके गुण बढ़ा देता है। शहद की तासीर ठंडी होती है और यह एनर्जी बूस्टर, इम्यूनिटी बढ़ाने वाला तथा आंतों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है। बीजवैक्स: मोम से बनते हैं कॉस्मेटिक और कैंडल मधुमक्खी के पेट के निचले हिस्से में मौजूद मोमी ग्रंथियों से बीजवैक्स (मधुमक्खी का मोम) बनता है। इसी मोम से छत्ता तैयार होता है, जिसमें शहद भरा जाता है। शहद निकालते समय मोम को अलग कर फिल्टर किया जाता है और गर्म पानी में उबालकर साफ किया जाता है। इस मोम का उपयोग कॉस्मेटिक उत्पादों, सेव-फलों की कोटिंग, नॉन-स्टिक बर्तनों की फूड-ग्रेड कोटिंग, लकड़ी की पॉलिश, फाइव स्टार होटल और चर्च की कैंडल बनाने में किया जाता है। बाजार में इसकी कीमत 500 से 600 रुपए प्रति किलो है। करीब 100 किलो शहद से आधा किलो मोम प्राप्त होता है। पोलन: प्रोटीन और विटामिन से भरपूर मधुमक्खियों द्वारा लाया गया पोलन (पराग) बॉक्स में लगाए गए पोलन ट्रैप से प्राप्त किया जाता है। यह प्रोटीन और बी-कॉम्प्लेक्स (B1 से B12) से भरपूर होता है। पोलन का उपयोग हाइट बढ़ाने, बॉडी बिल्डिंग, पैंक्रियाज को सक्रिय करने, ब्लड कैंसर के इलाज में सहायक रूप में, फूड एलर्जी और दवाइयों में किया जाता है। एक बॉक्स से प्रतिदिन 50 से 80 ग्राम पोलन मिलता है। हालांकि, मधुमक्खियों की ग्रोथ को ध्यान में रखते हुए पोलन ट्रैप तीन दिन से ज्यादा नहीं लगाया जाता। प्रोपोली: प्राकृतिक एंटीबायोटिक प्रोपोली एक तरह का प्राकृतिक गोंद है, जिसका उपयोग मधुमक्खियां छत्ते को मजबूत बनाने में करती हैं। इसे विशेष प्रोपोली शीट से निकाला जाता है। एक बॉक्स से सालाना 100 से 200 ग्राम प्रोपोली प्राप्त होती है। इसके गुण एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-सेप्टिक और एंटी-वायरल होते हैं। इसका उपयोग टूथपेस्ट, टिंचर, पायरिया, टॉन्सिल, आंतों के छाले, घाव और ट्यूमर के इलाज में किया जाता है। यह केवल अल्कोहल में घुलनशील होती है, इसी तरीके से इसे तैयार किया जाता है। रॉयल जेली: रानी मधुमक्खी का पोषण रॉयल जेली को मधुमक्खी का दूध भी कहा जाता है। वर्कर मधुमक्खियां इसे रानी मधुमक्खी को खिलाती हैं, जिससे रानी की उम्र 2 से 5 साल तक होती है, जबकि सामान्य मधुमक्खी केवल 60 दिन जीवित रहती है। रॉयल जेली को कृत्रिम विधि से एकत्र किया जाता है। इसका उपयोग आयु बढ़ाने, हाइट बढ़ाने और सौंदर्य उत्पादों में किया जाता है। बाजार में इसकी कीमत 60 हजार रुपए प्रति किलो तक होती है। एक बॉक्स से महीने में करीब 50 ग्राम रॉयल जेली मिलती है। बी-वेनम: सोने के बराबर कीमत वाला जहर मधुमक्खी के डंक से मिलने वाला बी-वेनम (जहर) सबसे महंगा उत्पाद माना जाता है। इसके लिए छत्ते के गेट पर विशेष मशीन लगाई जाती है, जिसमें 12 वोल्ट का हल्का झटका दिया जाता है। डंक मारते ही जहर कांच जैसी स्लाइड पर चिपक जाता है। बी-वेनम का उपयोग कॉस्मेटिक उत्पादों, चेहरे पर ग्लो बढ़ाने तथा एड्स और कैंसर जैसे गंभीर रोगों के इलाज में किया जाता है। बाजार में इसकी कीमत सोने के बराबर बताई जाती है। …. खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… एक आइडिया से लखपति हुआ किसान:24 बीघा में मॉडर्न तरीके से खेती, दिल्ली सहित कई मंडियों में इनके फल-सब्जियों की डिमांड अपने गांव वापस लौटने की इच्छा और अपनी जमीन पर आधुनिक खेती की शुरुआत करने की इच्छा ने किसान को सफलता के नए शिखर पर पहुंचा दिया। (पूरी खबर पढ़ें)

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