महाकुंभ में पिंडदान कर नागा बन रहे 5 हजार साधु:गंगा में 108 डुबकी लगाई; मौनी अमावस्या को जननांग की नस खींची जाएगी

प्रयागराज महाकुंभ में एक साथ 5 हजार नागा साधु बन रहे हैं। सभी जूना अखाड़े के हैं। शनिवार को नागा साधु बनने वाले साधकों ने संगम घाट पर अपना और अपनी सात पीढ़ियों का पिंडदान किया। इसी के साथ उनकी नागा साधु बनने से पहले दूसरी स्टेज अवधूत बनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। संगम पर साधकों ने 17 पिंड बनाएं, जिनमें से 16 उनकी सात पीढ़ियों के थे और एक उनका स्वयं का था। 19 जनवरी की सुबह जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज मंत्र देंगे। इस बीच उनकी कठिन साधना चलती रहेगी। 29 जनवरी को मौनी अमावस्या को तड़के सभी को नागा साधु बनाया जाएगा। 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा जूना अखाड़ा है, जिसके लगभग 5 लाख नागा साधु और महामंडलेश्वर संन्यासी हैं। इस बार महाकुंभ में 13 में से सात अखाड़ाें में 20 से 25 हजार नागा साधु बनाए जाने हैं। नागा साधुओं को सनातन धर्म का रक्षक कहा जाता है। 3 फोटो देखिए… जूना अखाड़े के प्रवक्ता नारायण गिरी बताया, नागा दीक्षा के लिए धर्म ध्वजा के नीचे तपस्या के साथ संस्कार की शुरुआत 24 घंटे पहले हो शुरू हो गई है। इसके लिए साधक 24 घंटे बिना भोजन-पानी के यह तपस्या कर रहे हैं। इसके बाद अखाड़ा कोतवाल के साथ सभी को गंगा तट पर ले जाया गया। गंगा में 108 डुबकी लगाने के बाद और कर्म और विजय हवन हुआ। पढ़िए नागा साधु बनने की पूरी प्रक्रिया नागा बनने की 3 स्टेज, अखाड़े वाले घर जाकर करते हैं पड़ताल आमतौर पर नागा बनने की उम्र 17 से 19 साल होती है। इसके तीन स्टेज हैं- महापुरुष, अवधूत और दिगंबर, लेकिन इससे पहले एक प्री-स्टेज यानी परख अवधि होती है। जो भी नागा साधु बनने के लिए अखाड़े में आवेदन देता है, उसे पहले लौटा दिया जाता है। फिर भी वो नहीं मानता, तब अखाड़ा उसकी पूरी पड़ताल करता है। अखाड़े वाले उम्मीदवार के घर जाते हैं। घर वालों को बताते हैं कि आपका बेटा नागा बनना चाहता है। घरवाले मान जाते हैं तो उम्मीदवार का क्रिमिनल रिकॉर्ड देखा जाता है। पहली स्टेज- महापुरुष : गुरु प्रेम कटारी से शिष्य की चोटी काटते हैं जो परख अवधि में खरा उतरता है, उसे वापस संसारी दुनिया में लौटने की सलाह दी जाती है। फिर भी वह नहीं लौटता है, तो उसे संन्यास जीवन में रहने की प्रतिज्ञा दिलाई जाती है। उसे ‘महापुरुष’ घोषित करके पंच संस्कार किया जाता है। पंच संस्कार यानी शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश को गुरु बनाना पड़ता है। अखाड़े की तरफ से इन्हें नारियल, भगवा वस्त्र, जनेऊ, रुद्राक्ष, भभूत सहित नागाओं के प्रतीक और आभूषण दिए जाते हैं। इसके बाद गुरु अपनी प्रेम कटारी से शिष्य की शिखा यानी चोटी काट लेते हैं। इस मौके पर शीरा और धनियां बांटा जाता है। दूसरी स्टेज- अवधूत : जीते जी खुद का पिंडदान, 108 डुबकियां लगानी पड़ती हैं महापुरुष को अवधूत बनाने के लिए सुबह चार बजे उठाया जाता है। नित्य कर्म और साधना के बाद गुरु इन्हें लेकर नदी किनारे पहुंचते हैं। उसके शरीर से बाल हटाकर नवजात बच्चे जैसा कर देते हैं। नदी में स्नान कराया जाता है। वह पुरानी लंगोटी छोड़कर नई लंगोटी धारण करता है। इसके बाद गुरु जनेऊ पहनाकर दंड, कमंडल और भस्म देते हैं। उसे 17 पिंड दान करने होते हैं। 16 अपने पूर्वजों के और 17वां पिंडदान खुद का। इसके बाद वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह नया जीवन लेकर अखाड़े में लौटता है।’ इसके बाद आधी रात में विरजा यानी विजया यज्ञ किया जाता है। गुरु एक बार फिर महापुरुष से कहते हैं कि वो चाहे तो सांसारिक जीवन में लौट सकता है। जब वह नहीं लौटता तो यज्ञ के बाद अखाड़े के आचार्य, महामंडलेश्वर या पीठाधीश्वर महापुरुष को गुरुमंत्र देते हैं। इसके बाद उसे धर्म ध्वजा के नीचे बैठाकर ऊं नम: शिवाय का जाप कराया जाता है। अगले दिन सुबह चार बजे महापुरुष को फिर गंगा तट पर लाया जाता है। 108 डुबकियां लगवाई जाती हैं। इसके बाद दंड-कमंडल का त्याग कराया जाता है। अब वह अवधूत संन्यासी बन जाता है। इस 24 घंटे की प्रक्रिया में उसे उपवास रखना होता है। तीसरी स्टेज- दिगंबर : जननांग की नस खींची जाती, कुंभ में शाही स्नान के बाद बनते हैं नागा ‘भारत में महाकुंभ’ किताब के मुताबिक अवधूत बनने के बाद दिगंबर की दीक्षा लेनी होती है। ये दीक्षा शाही स्नान से एक दिन पहले होती है। ये बेहद कठिन संस्कार होता है। इस दौरान गिने-चुने बड़े साधु ही मौजूद रहते हैं। इसमें अखाड़े की धर्म ध्वजा के नीचे उसे 24 घंटे बिना कुछ खाए-पिए व्रत करना होता है। इसके बाद तंगतोड़ संस्कार किया जाता है। इसमें सुबह तीन बजे अखाड़े के भाले के सामने आग जलाकर अवधूत के सिर पर जल छिड़का जाता है। उसके जननांग की एक नस खींची जाती है। साधक नपुंसक बन जाता है। इसके बाद सभी शाही स्नान के लिए जाते हैं। डुबकी लगाते ही ये नागा साधु बन जाते हैं। चार जगह लगने वाले कुंभ में जगह के हिसाब से इन नागा साधुओं को अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। प्रयाग के कुंभ में नागा साधु बनने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा और नासिक में खिचड़िया नागा कहा जाता है। जूना अखाड़े को जानिए… जूना अखाड़े की स्थापना सन 1145 में उत्तरांचल के कर्णप्रयाग में की गई थी। यहीं इनका पहला मठ बनाया गया था। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। भगवान शिव इनके आदि देव हैं। 13 में से सात अखाड़े शैव हैं जो शिव को मानते हैं। इन्हें संन्यासी अखाड़े भी कहते हैं। इसके अलावा तीन बैरागी और तीन उदासीन अखाड़े हैं। इन सभी 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा जूना अखाड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा नागा साधु और संत हैं। वर्तमान में इसके पीठाधीश्वर अवेधानंद जी महाराज सरस्वती हैं। नागा संन्यासी बनने की परंपरा नागा संन्यासी की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इस परंपरा का प्रारंभ कब हुआ, किसने किया, कहा नहीं जा सकता। कई ऋषि इनके प्रेरण स्रोत रहे हैं। जैसे- पतंजलि, अवदूत मुनि कपिल, ऋषभदेव। इन्हें इन लोगों का पूर्वज माना गया है। दत्तात्रेय को ये अपना इष्ट देवता मानते हैं। नागा साधुओं के दो अंग माने गए हैं। शस्त्रधारी और शास्त्रधारी। शस्त्रधारियों ने मल्ल विद्या सीखी और शास्त्रधारी शास्त्रों के अध्ययन में लगे। शस्त्रधारियों का संगठित रूप ही अखाड़े में दिखाई देता है। रणभूमि का हिस्सा बनने के लिए राजा नागाओं को देते थे न्योता इनके शौर्य से मध्यकालीन इतिहास भरा हुआ है। धर्म के खिलाफ, शासकों के खिलाफ इन्होंने लड़ाइयां लड़ी हैं। कई राजा इन्हें लड़ाइयां लड़ने के लिए बुलाया करते थे। 1666 में हरिद्वार में, 1748 में अहमद शाह अब्दाली से, 1757 में गोकुल में हजारों नागा साधुओं ने लड़ाइयां लड़ीं और वीरगति को प्राप्त हुए। इनमें स्वनाम धन्य गोसाईं और राजेंद्र गिरी का नाम प्रमुख है। इसके अलावा कच्छ और भुज में भी इन्होंने रण लड़े। मठ इनके गढ़ हुआ करते थे और यह हाथियों और घोड़ों पर चला करते थे। भाला और त्रिशूल तब भी इनका मुख्य हथियार होता था और आज भी है। मध्यप्रदेश में नागौद राज्य की नींव नागा संन्यासियों ने डाली। वहां के शासक इनके उपासक थे। —————————— यह भी पढ़िए… राजनाथ सिंह ने संगम में डुबकी लगाईं:सेना की मीटिंग लेंगे; महाकुंभ में ब्लास्ट की धमकी के बाद आधी रात तक सर्चिंग महाकुंभ का आज छठा दिन है। दोपहर 2 बजे तक 31 लाख श्रद्धालुओं ने स्नान किया। अब तक 7.5 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु संगम स्नान कर चुके हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दोपहर में संगम में डुबकी लगाई। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्होंने स्नान किया। साथ में मंत्री नंदी भी रहे। उनके पहुंचने से पहले आर्मी ने पूरे किला घाट को अपने कब्जे में ले लिया था। स्निफर डॉग्स और बम स्क्वॉड ने जांच की। पढ़ें पूरी खबर…

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