कोरबा सहित पूरे छत्तीसगढ़ में लोक पर्व छेरछेरा धूमधाम से मनाया गया। पौष माह की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस त्योहार पर बच्चे और युवा सुबह से ही घरों-घरों में दान मांगने निकले। लोगों ने उन्हें खुशी-खुशी चावल और नगदी दान की। कोरबा शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही बच्चे और युवा टोलियों में ‘छेरछेरा, माई कोठी के धान हेर हेरा’ कहते हुए घरों के दरवाजे पर पहुंचे। लोगों ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक धान, चावल, दाल या नगदी देकर इस परंपरा का निर्वहन किया। धान की फसल के घर आने पर मनाया जाता है त्योहार छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण पारंपरिक त्योहार है, जो धान की फसल के घर आने के बाद मनाया जाता है। यह पर्व किसानों की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है, जब उनकी मेहनत का फल धान के रूप में घर पहुंचता है। सीतामणी निवासी जयनारायण राठौर ने बताया कि छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और खुशहाली का प्रतीक है। यह त्योहार धान की फसल के घर आने पर मनाया जाता है, जिसमें बच्चे और युवा घर-घर जाकर चावल या नगदी एकत्र करते हैं। पौष माह की पूर्णिमा के दिन मनाते है छेरछेरा वार्ड नंबर 26 के पार्षद गोपाल कुर्रे ने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग है। यह पर्व लोगों को एक-दूसरे से जुड़ने और समाज में एकता का संदेश देता है, साथ ही बच्चों को अपनी संस्कृति समझने का अवसर भी प्रदान करता है। दादर खुर्द निवासी कृष्ण कुमार द्विवेदी ने बताया कि छेरछेरा पर्व पौष माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जो आमतौर पर जनवरी के महीने में आता है। यह छत्तीसगढ़ की एक महत्वपूर्ण लोक परंपरा है।


