जरहागांव | जरहागांव और आसपास के क्षेत्रों में छेरछेरा का एक नया और आधुनिक स्वरूप देखने को मिला, जहां परंपराओं के साथ तकनीक का सुंदर समन्वय नजर आया। अब तक छेरछेरा में केवल ढोल, मंजीरा और ताशा की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन इस बार युवाओं और बच्चों की टोलियों ने डीजे, स्पीकर और मोबाइल म्यूजिक सिस्टम का जमकर उपयोग किया। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों और सांस्कृतिक धुनों के साथ जब बच्चे नाचते-गाते घर-घर पहुंचे, तो यह नजारा पूरे गांव में आकर्षण का केंद्र बन गया। जब युवाओं की टोलियां छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेरहेरा जैसे पारंपरिक नारों को म्यूजिक के साथ प्रस्तुत कर रही थीं, तो घरों के बाहर खड़े लोग भी खुद को थिरकने से रोक नहीं पाए। डिजिटल साधनों के जुड़ाव से इस पर्व में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार देखा गया, जिससे प्रेरित होकर ग्रामीणों ने भी बढ़-चढ़कर अन्न और धन का दान दिया। युवाओं का मानना है कि डिजिटल साधनों के उपयोग से नई पीढ़ी लोक संस्कृति से अधिक जुड़ाव महसूस कर रही है। गांव के बुजुर्गों ने माना कि हालांकि पर्व की सादगी बदल रही है, लेकिन समय के साथ तकनीक का जुड़ाव स्वाभाविक है। उनका कहना है कि पर्व की मूल भावना- दान, सहयोग और सामाजिक समरसता बनी रहनी चाहिए। जरहागांव में छेरछेरा केवल अनाज मांगने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह तकनीक और परंपरा के मेल से सामाजिक सहभागिता का एक बड़ा उत्सव बन गया।


