इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 किसान-घरेलू उपभोक्ताओं के लिए आत्मघाती:यूपी बना टेस्ट केस, 6.9 लाख करोड़ का घाटा, फिर भी निजीकरण

केंद्र सरकार के इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को आगामी बजट सत्र में लोकसभा में पेश करने की तैयारी में है। इसे लेकर बिजली कर्मचारियों में आक्रोश देखा जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने इसे बिजली क्षेत्र का ‘कब्रिस्तान’ बनाने वाला बिल करार देते हुए चेतावनी दी है कि यदि यह विधेयक लागू हुआ तो दशकों में बनी एकीकृत बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। समिति का कहना है कि बिल का मकसद पूरे बिजली वितरण और उत्पादन को निजी हाथों में सौंपना है, जबकि घाटे का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र पर ही डाला जाएगा। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने कहा, “यह बिल किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए आत्मघाती साबित होगा। लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ और क्रॉस-सब्सिडी खत्म होने से बिजली दरें आसमान छू लेंगी।” उन्होंने याद दिलाया कि दिसंबर 2021 में संयुक्त किसान मोर्चा को सरकार ने लिखित आश्वासन दिया था कि सभी स्टेकहोल्डर्स की सहमति के बिना यह बिल संसद में नहीं लाया जाएगा। अब बजट सत्र में इसे पेश करना उस समझौते का सीधा उल्लंघन होगा। यूपी को बनाया जा रहा ‘टेस्ट केस उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की कोशिशों के बीच संघर्ष समिति को पूरे देश से मजबूत समर्थन मिल रहा है। समिति ने कहा कि केंद्र सरकार यूपी को निजीकरण का ‘टेस्ट केस’ मान रही है। देशभर के बिजली कर्मचारी और इंजीनियर अब यूपी के आंदोलन को पुरजोर समर्थन दे रहे हैं। समिति ने ऐलान किया कि बिल वापस कराने और निजीकरण रोकने के लिए संघर्ष को और तेज किया जाएगा। पहले भी 2014, 2018, 2020, 2021 और 2022 में ऐसे बिल लाए गए, लेकिन कर्मचारियों, किसानों, उपभोक्ता संगठनों और कई राज्य सरकारों के विरोध से पारित नहीं हो सके। समिति का दावा है कि नया बिल 2025 पुराने ड्राफ्ट्स से मिलता-जुलता है और इसके सभी प्रावधान निजीकरण को बढ़ावा देने वाले हैं। सरकार की ‘स्वीकारोक्ति’ ने खोली पोल संघर्ष समिति ने बिल की व्याख्यात्मक टिप्पणी पर तंज कसा। इसमें सरकार खुद मान रही है कि विद्युत अधिनियम 2003 लागू होने के 22 साल बाद भी वितरण कंपनियों का संचयी घाटा 26 हजार करोड़ से बढ़कर 6.9 लाख करोड़ हो गया। समिति बोली, “यह निजीकरण वाली नीतियों की नाकामी की खुद की गवाही है। फिर भी सरकार निजीकरण थोप रही है, जो स्थिति को और बदतर बनाएगा। यह बिल सार्वजनिक बिजली क्षेत्र में आखिरी कील साबित होगा।” समिति ने मांग की कि बिल तत्काल वापस लिया जाए और वास्तविक सुधारों के लिए बिजली इंजीनियर्स-कर्मचारियों से संवाद किया जाए। उन्होंने कहा कि बिल सार्वजनिक हित के बजाय बड़े निजी घरानों के फायदे के लिए बनाया गया है, जो उपभोक्ताओं के अधिकार, संघीय ढांचे और लाखों कर्मचारियों की नौकरियों को खतरे में डालता है।

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