मंदसौर जिले में पारंपरिक खेती के बीच एक नया प्रयोग सफल हो रहा है। सीतामऊ तहसील के गोपालपुरा गांव में किसान राकेश पाटीदार ने स्वीट माल्टा (मीठी संतरा या मौसंबी की एक विशेष किस्म) की खेती शुरू की है। यह जिले का एकमात्र व्यवसायिक बाग है। स्वीट माल्टा साइट्स परिवार का फल है, जो संतरे और मौसंबी से मिलता-जुलता है, लेकिन स्वाद में अधिक मीठा और रसीला होता है। इसका जूस बेहद स्वादिष्ट होता है। इसमें चीनी मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उद्यानिकी सलाह से ताईवान की किस्में उगाई राकेश पाटीदार ने उद्यानिकी विभाग की सलाह पर यह पहल की। उन्होंने पश्चिम बंगाल का दौरा कर वहां के स्वीट माल्टा बागों का अध्ययन किया और गूगल से भी जानकारी जुटाई। ताइवान की किस्मों के बारे में पढ़ने के बाद, उन्होंने 1000 पौधे लगाए। इन पौधों ने मात्र तीन साल में ही फल देना शुरू कर दिया, जिससे किसान को अच्छा लाभ मिलने लगा है। पौधों की निरंतर वृद्धि के साथ आय में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। स्वीट माल्टा की खेती संतरे से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन इसमें कई खासियतें हैं जो इसे किसानों के लिए अधिक फायदेमंद बनाती हैं। यह पौधा साल भर फल देता रहता है, जिससे बागवानी में नुकसान की संभावना कम होती है। इसमें फल जल्दी आता है और उत्पादन निरंतर होता है। संतरे में जहां समय से पहले बारिश जैसी मौसमी मार से फूल-फल झड़ जाते हैं, वहीं स्वीट माल्टा मौसम की अनियमितता से कम प्रभावित होता है, जिससे किसान की आय स्थिर रहती है। मंदसौर की मिट्टी में स्वीट माल्टा खेती सफल यह फल मुख्य रूप से जूस के लिए उपयोग किया जाता है। इसका स्वाद इतना मीठा होता है कि इसे बिना चीनी मिलाए ही बाजार में बेचा जा सकता है। भारत में स्वीट माल्टा की खेती उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों में प्रमुखता से होती है। मंदसौर जैसे मैदानी इलाके में यह एक नया प्रयोग है, जहां पहले संतरे की खेती होती रही है। मंदसौर की मिट्टी और जलवायु साइट्रस फलों के लिए अनुकूल मानी जाती है, जिससे यहां इसकी खेती की अपार संभावनाएं हैं। किसान बोले-विभाग की सलाह से लगाए 1000 पौधे राकेश पाटीदार बताते हैं, “उद्यानिकी विभाग की सलाह पर हमने यह खेती शुरू की। पश्चिम बंगाल में बाग देखकर उत्साहित हुए और 1000 पौधे लगाए। विभाग की निरंतर मार्गदर्शन से हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं।” उनका मानना है कि यह खेती पारंपरिक फसलों से ज्यादा मुनाफा देगी। स्वीट माल्टा विटामिन सी से भरपूर होता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। इसमें पोटैशियम, कैल्शियम जैसे खनिज भी होते हैं। यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और त्वचा के लिए फायदेमंद है। बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है, खासकर जूस और ताजे फल के रूप में। मंदसौर जिला पहले से अफीम, लहसुन और संतरे की खेती के लिए प्रसिद्ध है। अब स्वीट माल्टा जैसी नई फसलें किसानों को विविधता और अधिक आय का रास्ता दिखा रही हैं। किसान बोले-प्रति पौधा 40 किलो से ज्यादा फल देता किसान राकेश पाटीदार स्वीट माल्टा (मीठा संतरा) की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। वे बताते हैं कि इस फल के पौधों में रोपण के मात्र तीन साल बाद ही फल आना शुरू हो जाता है। शुरुआती चरण में ही एक पौधे से लगभग 40 किलो तक उत्पादन मिलता है, जबकि पौधों के पूरी तरह विकसित होने पर प्रति हेक्टेयर करीब 4 टन तक उपज मिलने की संभावना है। बाजार में स्वीट माल्टा 40 से 50 रुपए प्रति किलो की दर से बिक सकता है, जिससे किसानों को अच्छी आय मिलती है। राकेश पाटीदार के अनुसार, जैसे-जैसे पौधे परिपक्व होते जाते हैं, वैसे-वैसे उत्पादन में निरंतर बढ़ोतरी होती है, क्योंकि यह किस्म मजबूत और अधिक उपज देने वाली है। प्याज और लहसुन की इंटरक्रॉपिंग कर चुके हैं किसान वे लंबे समय से बागवानी कर रहे हैं और स्वीट माल्टा के पौधों के बीच प्याज और लहसुन की इंटरक्रॉपिंग भी करते हैं, जिससे अतिरिक्त आमदनी होती है और भूमि का बेहतर उपयोग हो पाता है। इसके अलावा वे संतरा और आवला की खेती भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि मिश्रित बागवानी से जोखिम कम होता है और सालभर आय का स्थिर जरिया बना रहता है, जो अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है। स्वीट माल्टा खेती किसानों को कर रही प्रेरित राकेश पाटीदार का यह प्रयोग अन्य किसानों को प्रेरित कर रहा है। उद्यानिकी विभाग भी ऐसी नवाचारी खेती को प्रोत्साहित कर रहा है। आने वाले समय में मंदसौर में स्वीट माल्टा के बाग बढ़ सकते हैं, जो जिले की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई देगा। यह पहल दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन और प्रयोग से पारंपरिक क्षेत्रों में भी नई फसलें सफल हो सकती हैं। किसान राकेश पाटीदार जैसे नवाचारी किसान मध्य प्रदेश की कृषि को मजबूत बना रहे हैं।


