पीजी कॉलेज झालावाड़ की प्रोफेसर अलका बागला द्वारा लिखित पुस्तक “पंडित आशाधर का धर्मामृत सागार एवं आस्तिक धर्म : एक समग्र दृष्टि” का विमोचन समारोह बारां में आयोजित किया गया। यह ग्रंथ मानव जीवन के दार्शनिक और नैतिक आयामों पर केंद्रित है। पुस्तक का विमोचन श्रीराम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि के उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय संत गोविंद देव गिरीजी महाराज ने किया। इस अवसर पर उद्योगपति विष्णु साबू, वैदिक ज्योतिषी हेमंत कासट, झालावाड़ जिला माहेश्वरी समाज के प्रतिनिधि बसंत कासट और सेवाभारती झालावाड़ जिलाध्यक्ष सूर्य प्रकाश माहेश्वरी सहित कई विद्वान और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। यह ग्रंथ जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधे मानव को धर्म की शरण में जाकर मुक्ति की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाता है। पुस्तक पंडित आशाधर जैसे महान चिंतक के गहन विचारों की शोधपरक प्रस्तुति है। लेखिका ने “धर्मामृत सागार” को व्यावहारिक जीवन को नैतिक अनुशासन में बदलने वाली एक प्रभावी मार्गदर्शिका के रूप में रेखांकित किया है। प्रोफेसर अलका बागला ने पुस्तक में यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि पंडित आशाधर का चिंतन अपने युगबोध से प्रेरित होते हुए भी सर्वकालिक और सर्वयुगीन है। वे अपने समय के नैतिक पतन से व्यथित होकर धर्म की पुनर्व्याख्या के माध्यम से समाज को अनुशासित करने का प्रयास करते हैं। पुस्तक जैन दर्शन के विविध आयामों का सूक्ष्म विवेचन करती है। इसमें दर्शाया गया है कि आशाधर का वैशिष्ट्य उनके समन्वयात्मक दृष्टिकोण में निहित है। वे जैन सिद्धांतों को दृढ़ता से प्रस्तुत करने के साथ-साथ वैदिक परंपरा के धार्मिक और नैतिक चिंतन से भी संवाद स्थापित करते हैं। उनका चिंतन संकीर्ण मतवाद से ऊपर उठकर एक सार्वभौमिक नैतिक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान समय में जब समाज नैतिक मूल्यों के संकट से जूझ रहा है। धर्म और धर्मांधता के बीच की रेखाएं धुंधली हो रही हैं और आस्था के नाम पर संकीर्णता को बढ़ावा मिल रहा है। ऐसे में आशाधर जैसे चिंतक की तर्कयुक्त श्रद्धा, स्वावलंबन और धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षाएं अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं। लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि आशाधर के चिंतन को समसामयिक शिक्षा, समाज और संस्कृति में समाहित किया जाए तो समाज को सहज ही संतुलित और नैतिक दिशा प्रदान की जा सकती है। विमोचन अवसर पर राष्ट्रीय संत गोविंद देव गिरीजी महाराज ने लेखिका प्रोफेसर अलका बागला को इस महत्वपूर्ण और श्रमसाध्य कार्य के लिए हार्दिक बधाई एवं साधुवाद प्रदान किया। उन्होंने कहा कि एक महान विचारक के चिंतन को आधुनिक पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रयास जैन साहित्य और भारतीय धर्म-दर्शन के क्षेत्र में निश्चित ही अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।


