बेजुबानों के हक के लिए ‘करो या मरो’ आंदोलन:जैसलमेर से दिल्ली तक देश के 50 शहरों में गूंजी जानवरों के संरक्षण की आवाज

स्वतंत्र भारत के इतिहास में सामुदायिक पशुओं के कल्याण के लिए एक ऐतिहासिक अध्याय लिखा गया। जैसलमेर सहित देश के 50 प्रमुख शहरों में एक साथ ‘करो या मरो’ आंदोलन के बैनर तले नागरिकों ने एकजुट होकर बेजुबानों के संरक्षण के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। राजस्थान से इस मुहिम में जैसलमेर और जयपुर के निवासियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जैसलमेर जिले के खुहड़ी गांव में आयोजित हुए कार्यक्रम में पशु प्रेमी व ग्रामीण इकठ्ठा हुए। पशु प्रेमियों का यह शांतिपूर्ण जमावड़ा आगामी 7 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अहम सुनवाई को ध्यान में रखकर किया गया है। कोर्ट द्वारा संभावित कड़े दिशा-निर्देशों के मद्देनजर, नागरिकों ने सरकार और न्यायपालिका तक यह संदेश पहुँचाया कि सामुदायिक पशुओं के हितों की रक्षा करना समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। 50 शहरों की एकजुटता: एक नया रिकॉर्ड ‘इंडिया फॉर एनिमल्स’ टीम के मार्गदर्शन में आयोजित यह कार्यक्रम अपनी तरह का पहला और ऐतिहासिक आयोजन माना जा रहा है। जैसलमेर में कार्यक्रम के आयोजक अंगद सिंह और सवाई सिंह ने बताया कि यह आंदोलन 18 दिसंबर को कोर्ट में हुई गतिविधियों की प्रतिक्रिया के रूप में शुरू किया गया था। महज कुछ ही दिनों के भीतर पूरे देश के पशु प्रेमियों ने एकजुट होकर अपनी ताकत दिखाई। दिल्ली से शुरू हुई यह पहल देखते ही देखते एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल गई। 7 जनवरी की सुनवाई पर टिकी नजरें पशु प्रेमियों का यह शांतिपूर्ण जमावड़ा आगामी 7 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अहम सुनवाई को ध्यान में रखकर किया गया है। कोर्ट द्वारा संभावित कड़े दिशा-निर्देशों के मद्देनजर, नागरिकों ने सरकार और न्यायपालिका तक यह संदेश पहुँचाया कि सामुदायिक पशुओं के हितों की रक्षा करना समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। अहिंसा और विज्ञान पर जोर ‘इंडिया फॉर एनिमल्स’ की राष्ट्रीय आयोजन समिति के मुख्य सदस्य डॉ. सैनी ने स्पष्ट किया कि ‘करो या मरो’ का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि एकता और करुणा का नैतिक संदेश है। उन्होंने जोर देते हुए कहा: “पशुओं और इंसानों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तभी संभव है जब हम नसबंदी, टीकाकरण और सामुदायिक देखभाल जैसे वैज्ञानिक समाधानों को अपनाएं।” मुख्य बिंदु:

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