कोरोना के बाद हथकरघा उद्योग ने करीब 25 प्रतिशत ग्रोथ की है। जिले में 30 से अधिक गांवों में 10 हजार परिवार इससे सीधे जुड़े हुए हैं। इनमें 40 हजार महिलाएं पूरी तरह सक्रिय हैं और घर बैठे रोजगार कमा रही हैं। हर महीने 2 लाख किलो ऊनी धागे का प्रोडक्शन हो रहा है। इस धागे से बने कारपेट दुनियाभर में बिक रहे हैं। राजस्थान राइजिंग ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट में पहल करके उद्यमियों ने हैंडलूम सेक्टर में पहली बार 20 करोड़ से अधिक के एमओयू किए हैं। प्रदेश में बीकानेर ही एक मात्र ऐसा जिला हैं, जहां यह उद्योग सबसे ज्यादा फलफूल रहा है। जयपुर में कूकस और ब्यावर में भी काम होता है, लेकिन सीमित स्तर पर है। इस उद्योग से जुड़े युवा उद्यमी रोहित अग्रवाल और ऋषभ बोथरा से बात की तो पता चला कि जिले में 30 से अधिक गांव और ढाणियों में महिलाएं चरखा कात कर ऊनी धागा बना रही हैं। करीब दस हजार परिवार के एक लाख लोग इससे जुड़े हुए हैं, जिनमें 40 हजार एक्टिव महिलाएं शामिल हैं। नोखा के पास भादला गांव में 80 प्रतिशत महिलाएं गांधी चरखे पर ऊनी धागा बुनने के उद्योग से जुड़ी हुई हैं। इसी प्रकार कक्कू, कुंभासर, जोधपुर के रिडमलसर में भी महिलाएं इसी व्यवसाय में जुट गई हैं। महिलाओं को एक किलो धागे के औसत 65 रुपए मिलते हैं। एक दिन में वे दो से तीन किलो तक धागा बना लेती हैं। एक परिवार की सभी महिलाएं इस काम में जुटी रहती हैं। यह व्यवसाय उनके लिए घर बैठे आमदनी का अच्छा जरिया बन गया है। अग्रवाल ने बताया कि कोरोना के बाद चायना और बांग्लादेश का बाजार भी भारत में शिफ्ट होने से इस उद्योग में ग्रोथ बढ़ गई है। अग्रवाल के अनुसार केवल हथकर्घा उद्योग से ही 16.25 करोड़ की लागत से 25 लाख किलो ऊनी धागे का प्रोडक्शन हर साल होता है। बीकानेर में हर साल एक हजार करोड़ के ऊनी धागे का निर्माण हो रहा है। इसके लिए ऊन इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड सहित अन्य देशों से भी आ रही है। हर रोज दो लाख किलो ऊनी धागे का निर्माण मशीनों से होता है। जिले में 150 वूलन इंडस्ट्रीज के पास 250 कार्ड हैं, जहां धागा बनाया जा रहा है। इस ऊन से एक हजार रुपए फीट से चार हजार रुपए फीट तक तक हाईग्रेड कारपेट बनता है। एक्सपोर्ट… हर साल 12 हजार करोड़ रुपए का
भारत से हर साल औसत 12 हजार करोड़ का कारपेट एक्सपोर्ट हो रहा है। उद्यमी रोहित अग्रवाल ने बताया कि भदोई से पांच हजार करोड़, पानीपत से 2500 करोड़, दक्षिण भारत से एक हजार करोड़, आगरा, जयपुर, कश्मीर से 500-500 करोड़, बीकानेर से 250, मेरठ से 200 करोड़ का कारपेट विदेशों में जाता है। भारतीय कारपेट का 50 प्रतिशत का खरीदार अमेरिका है। यूरोप में 25 प्रतिशत माल जाता है। ऊन, पोलिस्टर, नाइलोन, सिल्क और जूट का धागा मिक्स करके हाईब्रीड कारपेट तैयार करते हैं। फिनिशिंग ही उसकी पहचान है। भले ही विदेशी कंपनियां उन्हें अपना टैग लगाकर बेचे, लेकिन उन पर मेड इन इंडिया के साथ उस स्थान का नाम भी कायम रहता है, जहां उसका निर्माण हुआ था। “हैंडलूम सेक्टर में भी पहली बार उद्यमियों ने पहल की है। 20 करोड़ से अधिक के एमओयू हुए हैं। इससे हथकरघा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। महिलाओं के लिए घर बैठे रोजगार के अवसर खुलेंगे।”
-मंजू नैण गोदारा, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र


