7 दिसंबर को एम्स भोपाल कैंपस में मौजूद सेंट्रल इंडिया के पॉइजन इन्फॉर्मेशन सेंटर (PIC) में फोन की घंटी बजी। फोन एमपी के सीधी जिले से था। उधर लाइन पर निजी अस्पताल का स्टाफ घबराई आवाज में बोल रहा था कि छह साल का एक मासूम अपने घर के आंगन में खेल रहा था। खिलौनों के बीच कीटनाशक की शीशी आ गई। खेल-खेल में उसने मुंह से ढक्कन खोलने की कोशिश की और पल भर में हालत गंभीर हो गई। बच्चे की आंखें भारी होने लगीं, शरीर ढीला पड़ता चला गया और वह बेहोशी की ओर बढ़ने लगा। पास में ही बैठी दादी की नजर जब उस पर पड़ी तो वो उसे लेकर स्थानीय अस्पताल पहुंची। यह जानकारी मिलते ही पीआईसी में मौजूद डॉक्टर सतर्क हो गए और तुरंत इलाज की पूरी प्रक्रिया समझाने लगे। यह घटना एक बच्चे से जुड़ी हुई नहीं हैं। PIC के आंकड़े बताते हैं कि देश में जहर की चपेट में आने वाला हर दूसरा विक्टिम 10 साल से छोटा बच्चा है। इस सेंटर में साल 2020 से अब तक 786 फोन कॉल देशभर से आए हैं। जिसमें से 401 फोन कॉल में विक्टिम की आयु 10 साल से कम थी। बच्चों के लिए कीटनाशक क्यों खतरा
अकेले मध्यप्रदेश और कर्नाटक में अब तक बच्चों के कीटनाशक की चपेट में आने के करीब 80 मामले दर्ज किए गए हैं। 27 दिसंबर को एक कॉल कर्नाटक के कारवार से आया। जिसमें विक्टिम 8 साल का बच्चा था। इस केस में भी पीड़ित निजी अस्पताल में भर्ती था। अस्पताल में इलाज कर रहे डॉक्टर ने बताया कि पीड़ित बच्चे के हाथ खेल-खेल में कृषि रसायन लग गया था। उसका घर खेत के पास है और बच्चा अपनी मां और दो बहनों के साथ वहां गया हुआ था। परिजनों को उसकी आवाज नहीं आई तो वो देखने पहुंचे तो बच्चे बेहोशी हालत में खेत में बनी झोपड़ी के पास पड़ा हुआ था। टॉयलेट क्लीनर पीकर सुसाइड अटेंप्ट
PIC से मिली जानकारी के अनुसार सुसाइड अटेंप्ट करने वालों में सबसे ज्यादा व्यस्क लोग हैं। वहीं, जहर पी कर सुसाइड करने वालों में दो तरीके बेहद कॉमन हैं। इसमें से एक है थैरेप्यूटिक ड्रग्स यानी दवाइयां और दूसरा कॉरोसिव और इरिटेंट पदार्थ हैं। इसमें टॉयलेट क्लीनर सबसे कॉमन है। इसके बाद फिनाइल, ब्लीच या अन्य घरेलू रसायन का भी लोग सेवन कर लेते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, आमतौर पर इनसे लोगों की मौत नहीं होती है। बच्चों के लिए यह जानलेवा हो सकता है, लेकिन व्यस्क मरीज को बचा लिया जाता है। इनका सेवन करने वाले विक्टिम को जीवनभर के लिए कई समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। वहीं, टॉयलेट क्लीनर से शरीर को पहुंचने वाले नुकसान स्थायी होते हैं। इनका कोई सीधा इलाज मौजूद नहीं है। जिसके जरिए इसके असर को खत्म किया जा सके। टॉयलेट क्लीनर में नजर आते हैं यह लक्षण
टॉयलेट क्लीनर में हाइड्रोक्लोरिक एसिड जैसे तेज केमिकल होते हैं। इसकी तेज गंध सांस की नली को चुभती है। सांस से संपर्क होने पर आंख-नाक में जलन, खांसी, सांस फूलना और बंद जगह में दम घुटने का खतरा रहता है। त्वचा या आंखों पर गिरने से रासायनिक जलन और गंभीर घाव हो सकते हैं। निगलने पर होंठ, मुंह, गला, भोजन नली और पेट में तेज जलन, दर्द और उल्टी जैसी शिकायतें होती हैं। बचाव के उपाय चूहामार दवा खाने पर दिखते हैं गंभीर संकेत
इस तरह की दवाओं से निकलने वाली गैस और शरीर में बनने वाले विषैले तत्व कई अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। शुरुआती लक्षणों में अत्यधिक प्यास, मुंह में धातु-सा स्वाद, लहसुन जैसी गंध, पेट में जलन-दर्द, उल्टी-दस्त शामिल हैं। आगे चलकर तंत्रिका तंत्र (बेचैनी, चक्कर, बेहोशी), हृदय (धड़कन गड़बड़), श्वसन (सांस लेने में तकलीफ), किडनी और यकृत पर असर पड़ सकता है। यह स्थिति अत्यंत आपातकालीन होती है। बचाव के उपाय अब PIC को PCC बनाने की योजना, 2 हजार तरह के जहर का होगा इलाज एम्स कैंपस में मौजूद PIC (पॉइजन इन्फॉर्मेशन सेंटर) को PCC (पॉइजन कंट्रोल सेंटर) में अपग्रेड किया जा रहा है। जिससे ना केवल यह सेंटर फोन पर मरीजों की जान बचाने के लिए इलाज बताएगा बल्कि यहां के एक्सपर्ट इलाज भी करेंगे। शुरुआत में एम्स भोपाल में आने वाले मरीजों को ही पॉइजन कंट्रोल सेंटर के एक्सपर्ट इलाज मुहैया कराएंगे। इसके बाद ट्रेनिंग सेशन आयोजित होंगे, जिसके जरिए जिला अस्पताल के डॉक्टरों को पॉइजन कंट्रोल की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसका मकसद हर मरीज तक जहर का बेस्ट इलाज पहुंचाना है। डॉक्टरों के अनुसार, जहर की चपेट में आने पर मरीज को सही इलाज मिले तो 70 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में जान बचाई जा सकती है। केंद्रीय हेल्थ मिनिस्ट्री के अधीन एक कमेटी बनाई गई है। यह कमेटी इन दोनों सेंटर को एक यूनिफॉर्म स्ट्रक्चर में लाएगी। जिससे देश में जहर के मामलों का सही आकलन किया जा सके। इस कमेटी में एम्स भोपाल से डॉ. राघवेंद्र विदुआ को शामिल किया गया है। डॉ. विदुआ के अनुसार, भारत अपना डेटाबेस तैयार करेगा। जिसमें देश में होने वाले जहर के केस और उनके इलाज की जानकारी स्टोर होगी। सेंट्रल इंडिया में इस प्रोजेक्ट को एम्स भोपाल लीड करेगा। जहां, गंभीर से गंभीर जहर के मामलों का इलाज मुहैया कराने की जिम्मेदारी केंद्र से सौंपी जा रही है। ऐसे होता है सेंटर में काम
सेंटर में फोन कर डॉक्टर बताते हैं कि किस चीज का सेवन किया या उसके लक्षण या उसमें कौन सा तत्व है। इसमें से कुछ भी बताने पर सेंटर के चिकित्सक उस जानकारी को साफ्टवेयर में डालकर फौरन उसका इलाज बताते हैं। इस साफ्टवेयर में उस जहर के खाने से शरीर में होने वाले नुकसान, लक्षण व इलाज के बारे में सारी जानकारी मौजूद है। पॉइजन इन्फॉर्मेशन सेंटर के इंचार्ज डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ ने बताया इस सेंटर में 2 हजार तरह के जहर के ब्योरा वाला एक साफ्टवेयर है। जिसमें लगभग हर जहर का इलाज मौजूद है। कोई भी डॉक्टर या हेल्थ केयर वर्कर एक फोन से जहर का इलाज पता कर सकता है। 24×7 मिलती है जानकारी ये खबर भी पढ़ें… जापान की तर्ज पर भोपाल में बिना चीरफाड़ होगा पोस्टमॉर्टम भोपाल जल्द ही देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो सकता है, जहां बिना चीरफाड़ के पोस्टमॉर्टम किया जाएगा। जापान और अन्य विकसित देशों की तर्ज पर एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी शुरू करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया गया है। इस मॉडर्न तकनीक से शव का पोस्टमॉर्टम बिना किसी सर्जिकल कट के संभव होगा। पढ़ें पूरी खबर…


