छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में एक सामाजिक बहिष्कार का मामला सामने आया है, जहां समाज के पदाधिकारियों ने किसी व्यक्ति को समाज से बाहर नहीं निकाला, बल्कि समाज के लोग ही उससे संपर्क करना बंद कर दिया। यह मामला डोंगरगांव ब्लॉक के मटिया रोड के रहने वाले अब्दुल बाबर से जुड़ा हुआ है। बाबर ने बताया कि करीब एक साल पहले समाज के हित में काम करने के लिए कुछ लोगों ने अपनी जमीन दान की थी, लेकिन उन जमीनों को बिना किसी सूचना के बेच दिया गया। जब बाबर ने इस बारे में सवाल किया, तो समाज के पदाधिकारियों ने उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया और उन्हें समाज से पूरी तरह अलग कर दिया। अब करीब 6 महीने से वे इस सामाजिक बहिष्कार का शिकार हैं, और मानसिक तथा शारीरिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं। प्रशासन पर कार्रवाई में लापरवाही का आरोप इस मामले को लेकर बाबर ने पुलिस से लिखित शिकायत की थी, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि वे पुलिस और प्रशासन से कई बार मदद की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बाबर ने यह भी आरोप लगाया कि डोंगरगांव पुलिस ने उनकी शिकायत को नजरअंदाज किया और कार्रवाई करने से मना कर दिया। पुलिस और प्रशासन पर उठे सवाल इस मामले पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि 21वीं सदी में सामाजिक बहिष्कार जैसे मामलों में पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की? बाबर ने यह आरोप भी लगाया कि जब उन्होंने डोंगरगांव पुलिस थाने में शिकायत दी, तो उन्हें वापस लौटा दिया गया और कहा गया कि यह सामाजिक मामला है, इसमें दखल नहीं देंगे। आत्महत्या की चेतावनी अब्दुल बाबर ने कहा कि इस हालात में वह आत्महत्या करने के बारे में सोचने को मजबूर हो गए हैं। उन्होंने बताया कि उनके हुक्का पानी बंद होने के बाद सामाजिक दायित्व निभाना मुश्किल हो गया है और लगातार मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। कलेक्टर और पुलिस की प्रतिक्रिया कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं मिली है, लेकिन अगर कोई सामाजिक बहिष्कार का मामला है, तो पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए। थाना प्रभारी अवनीश श्रीवास ने कहा कि डोंगरगांव थाने में 200 मामले पेंडिंग हैं, लेकिन वह जल्द ही बाबर की शिकायत की गंभीरता से जांच करेंगे और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


