7 डिजिट वाहन नंबरों में बड़ा घोटाला; 5 लाख का बैकलॉग, सिर्फ 35 हजार की ही जांच हुई

परिवहन विभाग की ओर से 7 डिजिट वाहन नंबरों की जांच रिपोर्ट में नया खुलासा हुआ है। प्रदेशभर में 7 डिजिट नंबरों का करीब 5 लाख बैकलॉग सामने आया है, लेकिन विभाग ने इनमें से केवल 35 हजार नंबरों की ही जांच करवाई। इन 35 हजार नंबरों में से 9,500 नंबरों के आवंटन में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। हैरानी की बात यह है कि शेष 25,500 नंबरों की जांच किए बिना ही समिति ने आधी-अधूरी रिपोर्ट अधिकारियों को सौंप दी। इसके बाद जांच समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर शेष नंबरों की जांच क्यों नहीं की गई और किन अधिकारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। आईटी अधिकारियों को क्लीन चिट, प्रोग्रामर दोषी जांच समिति ने आठ साल तक आरटीओ प्रथम में कार्यरत किसी भी आईटी अधिकारी को दोषी नहीं माना, जबकि एक प्रोग्रामर को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि इस दौरान नियुक्त आईटी अधिकारियों की ओर से ही कर्मचारियों को वाहनों के बैकलॉग, एंट्री और अप्रूवल की स्वीकृति दी जाती रही। सवाल यह भी है कि यह स्वीकृतियां किसके आदेश पर जारी हुईं। इतना ही नहीं, आईटी अधिकारियों ने ठेके पर काम करने वाले निजी व्यक्तियों तक को लॉगिन आईडी जारी कर दी। इन्हीं आईडी से 7 डिजिट वाहनों का बैकलॉग, एंट्री और अप्रूवल किया गया। इसके बावजूद जांच टीम ने न तो हैड ऑफ द ऑफिस और न ही आईटी अधिकारियों को दोषी माना। राजस्व नुकसान पर दोहरी रिपोर्ट; विभाग में यह भी चर्चा है कि उप वित्तीय सलाहकार द्वारा वित्त विभाग को 7 डिजिट सीरीज को लेकर एक नोट भेजा गया, जिसमें लिखा गया कि सरकार को इन नंबरों से किसी प्रकार का राजस्व नुकसान नहीं हुआ। वहीं दूसरी ओर जांच समिति ने 9,500 नंबरों के गलत आवंटन से सरकार को करीब 600 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का खुलासा किया है। एक ही मामले में दो अलग-अलग निष्कर्ष सामने आने से विभाग की नीति पर सवाल उठ रहे हैं। इंटरनल ऑडिट में भी नहीं पकड़ा गया घोटाला 7 डिजिट नंबरों के गलत आवंटन के बाद अब परिवहन विभाग की लेखा शाखा के अधिकारी भी जांच के घेरे में आ गए हैं। करीब 9 वर्षों तक अधिकारी और कर्मचारी गलत तरीके से नंबरों का आवंटन करते रहे, जिससे विभाग को बड़ा राजस्व नुकसान हुआ। इसके बावजूद लेखा शाखा के अधिकारी हर साल होने वाले इंटरनल ऑडिट में इस गड़बड़ी को पकड़ने में असफल रहे। नौ वर्षों तक किसी को इस घोटाले की भनक तक नहीं लगी। जांच में यह भी सामने आया कि 2016 से आरटीओ रहे अधिकारी कार्यालय अध्यक्ष और एडमिन के रूप में कर्मचारियों को वर्क फ्लो और कार्य आवंटन करते रहे। 2016 में जारी आदेश के तहत पुराने 7 डिजिट सीरीज नंबरों को डीओआईटी के हैड संजय सिंघल और एनआईसी हैड लीलाधर को बैकलॉग के रूप में पब्लिक डोमेन में ऑनलाइन करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद इन नंबरों को ऑनलाइन नहीं किया गया। एफआईआर को लेकर भी सवाल: आरटीओ की ओर से दर्ज एफआईआर में परिवहन निरीक्षक सुरेंद्र गुलिया का नाम शामिल किया है, जबकि वे जयपुर में पदस्थापित नहीं रहे। हालांकि जयपुर के बैकलॉग नंबरों का सलूंबर में आवंटन गुलिया ने किया था, जिसके चलते उन्हें निलंबित किया जा चुका है। एफआईआर से महिला कर्मचारी का नाम हटाने को लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं।

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