मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के महाधिवक्ता कार्यालय में की गई 155 लॉ ऑफिसरों की नियुक्ति को लेकर शुक्रवार को अहम सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार, महाधिवक्ता कार्यालय और सभी नवनियुक्त लॉ ऑफिसरों को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई अब 2 फरवरी को होगी। यह सुनवाई चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी अधिवक्ता एवं हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सह सचिव योगेश सोनी ने कोर्ट को बताया कि महाधिवक्ता कार्यालय में लॉ ऑफिसरों की नियुक्ति नियमों को दरकिनार कर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना में तय नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए भर्ती की गई है। अन्य राज्यों के वकीलों को नियुक्त दी याचिकाकर्ता का कहना है कि राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में रजिस्टर्ड वकीलों को मध्यप्रदेश में सरकारी वकील के पद पर नियुक्त किया गया है, जो नियमों के विपरीत है। उन्होंने तर्क दिया कि स्थानीय अधिवक्ताओं की अनदेखी कर बाहरी राज्यों के वकीलों को प्राथमिकता दी गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन की उस अर्जी को भी स्वीकार कर लिया, जिसमें दूसरे राज्यों के वकीलों की नियुक्ति पर कड़ा ऐतराज जताया गया है। बार एसोसिएशन का कहना है कि मध्यप्रदेश के योग्य और अनुभवी अधिवक्ताओं को दरकिनार कर बाहरी वकीलों को मौका देना न्यायसंगत नहीं है। भर्ती में नियमों के खुले उल्लंघन का आरोप याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने बताया कि 25 दिसंबर को विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी नियुक्ति सूची में नियमों का खुला उल्लंघन हुआ है। याचिका के अनुसार सरकारी वकील की नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया और न्यूनतम अनुभव तय है, लेकिन सूची में ऐसे कई नाम शामिल हैं जिनका वकालत का अनुभव 10 वर्ष से भी कम है, जो अनिवार्य शर्तों के खिलाफ है।


