सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए मप्र के 80 वर्षीय बुजुर्ग को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट असंवेदनशील नहीं हो सकतीं। इस उम्र में किसी बुजुर्ग को दोबारा जेल भेजना कठोर होगा। हालांकि कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी है और सजा को पहले से काटी गई जेल अवधि तक सीमित कर दिया। जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि आरोपी जीवन के अंतिम पड़ाव में है। ऐसे में उसे फिर से जेल भेजना न तो जरूरी है और न उचित। आरोपी गैर इरादतन हत्या के मामले में दोषी है। हाई कोर्ट ने उसे 7 साल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। कोर्ट के मुताबिक आरोपी अब तक 6 साल 3 महीने जेल में रह चुका है। उसे दिसंबर 1992 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसे जमानत मिली। अलग-अलग चरणों में वह जेल और जमानत पर रहा। मामला क्या था? : 1992 में आरोपी के बेटे व एक अन्य व्यक्ति के बीच झगड़ा हुआ। मारपीट हुई। घटना में एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। कोर्ट ने क्या कहा? : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला अचानक हुए झगड़े और मारपीट का था, इसे सोची-समझी हत्या नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाई कोर्ट द्वारा हत्या की धारा हटाकर गैर इरादतन हत्या की धारा लगाना सही ठहराया गया। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि दोष बना रहेगा, लेकिन सजा पहले से भुगती गई जेल अवधि तक ही मानी जाएगी।


